बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा समेत मौजूदा पदाधिकारियों के BCI का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी BCI-PEARL FIRST Trust के स्थायी ट्रस्टी बने रहने से जुड़े प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ BCI चेयरमैन के लंबे समय तक जारी रहने को चुनौती देने वाली याचिकाओं और BCI-PEARL FIRST Trust के कामकाज से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई कर रही थी।

“क्या निर्वाचित निकाय स्थायी ट्रस्ट बना सकता है?”

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि 2020 में पुराने BCI Trust की जगह बनाए गए BCI-PEARL FIRST Trust के Trust Deed के तहत मौजूदा ट्रस्टी BCI में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी स्थायी मैनेजिंग ट्रस्टी बने रह सकते हैं।

इस पर जस्टिस बागची ने सवाल उठाया:

“क्या निर्वाचित निकाय ऐसा स्थायी ट्रस्ट बना सकता है, जिसमें वही निर्वाचित सदस्य अपने पद की अवधि खत्म होने के बाद भी स्थायी ट्रस्टी बने रहें?”

जस्टिस बागची ने कहा कि BCI Advocates Act की धारा 5 के तहत एक juristic body है और इसका गठन निर्वाचित सदस्यों से होता है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या निर्वाचित सदस्यों के जरिए बनाए गए ट्रस्ट में वे व्यक्ति BCI में अपना पद खत्म होने के बाद भी ट्रस्टी बने रह सकते हैं।

उन्होंने आगे पूछा कि यदि BCI चेयरमैन का ट्रस्टी होना ex-officio है, तो व्यक्ति के पद पर नहीं रहने के बाद वह व्यक्तिगत रूप से ट्रस्टी कैसे बना रह सकता है।

पुराने और नए Trust Deed में अंतर

वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय सिंह ने कोर्ट को बताया कि 1974 के पुराने BCI Trust Deed में ट्रस्टी का BCI का सदस्य होना जरूरी था। जैसे ही कोई व्यक्ति BCI का सदस्य नहीं रहता था, उसकी ट्रस्टी के रूप में भूमिका भी समाप्त हो जाती थी।

इसके विपरीत, याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 2020 के नए Trust Deed में ट्रस्टियों को BCI में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी बने रहने की अनुमति दी गई है।

ट्रस्ट की संपत्तियों और वित्तीय मामलों पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान BCI-PEARL FIRST Trust की वित्तीय गतिविधियों और संपत्तियों को लेकर भी सवाल उठाए गए।

वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने बताया कि ट्रस्ट को अमरावती में लॉ यूनिवर्सिटी के लिए जमीन का टेंडर मिला है और गोवा में भी उसके पास 56 एकड़ जमीन है।

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने ट्रस्ट की वित्तीय गतिविधियों की जांच की मांग करते हुए बताया कि एक वित्तीय वर्ष में ट्रस्ट को ₹4.41 करोड़ प्राप्त हुए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से हाई-लेवल जांच और ट्रस्ट के मामलों की निगरानी के लिए एक ओवरसाइट कमेटी बनाने का सुझाव भी दिया गया। इसके लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कदम-दर-कदम आगे बढ़ने की बात कही

हालांकि, पीठ ने इस चरण पर व्यापक न्यायिक हस्तक्षेप या तुरंत किसी कमेटी के गठन को लेकर सावधानी बरती।

CJI सूर्यकांत ने कहा:

“Let us go step by step.”

उन्होंने कहा कि चूंकि हाल ही में State Bar Council के चुनाव पूरे हुए हैं और नई BCI के गठन की प्रक्रिया शुरू होने वाली है, इसलिए पहले यह देखा जाना चाहिए कि नई BCI का गठन कैसे होता है।

कोर्ट ने नई State Bar Councils के गठन और उनके प्रतिनिधियों के जरिए नई BCI के चुनाव की प्रक्रिया तेज करने के लिए समयसीमा भी तय की है।

NALSAR विवाद के बाद उठा मामला

BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को चुनौती देने वाली याचिकाएं NALSAR विवाद के बाद दायर की गई थीं। विवाद के दौरान NALSAR छात्रों द्वारा CJI सूर्यकांत को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बुलाए जाने पर आपत्ति जताए जाने के बाद मिश्रा ने उनके एनरोलमेंट को लेकर निर्देश जारी किए थे। बाद में व्यापक आलोचना के बाद उन्होंने माफी मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट अब BCI की नई निर्वाचित संरचना के गठन की प्रक्रिया पर भी नजर रख रहा है। नई BCI के गठन के बाद ट्रस्ट और उसके स्थायी ट्रस्टियों से जुड़े सवालों पर आगे विचार किया जा सकता है।

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