1992 बाबरी मस्जिद विध्वंस की साजिश: सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसला सुनाने की डेडलाइन 31 अगस्त तक बढ़ाई 

Babri Demolition Case : SC Extends Deadline For CBI Court To Deliver Judgment Till August 31,2020

Update: 2020-05-08 12:46 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को लखनऊ की स्पेशल सीबीआई कोर्ट द्वारा 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की साजिश मामले के ट्रायल का फैसला सुनाने के लिए लखनऊ की समय सीमा 31 अगस्त, 2020 तक बढ़ा दी।

जस्टिस आर एफ नरीमन और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि ट्रायल जज को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वर्तमान समय सीमा का अब " उल्लंघन न हो।

19 जुलाई, 2019 को इसी पीठ ने ट्रायल कोर्ट को छह महीने के भीतर सबूतों की रिकॉर्डिंग पूरी करने और नौ महीने के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश दिया था।

कोर्ट ने यूपी सरकार को यह भी निर्देश दिया था कि वह सीबीआई कोर्ट, लखनऊ के विशेष न्यायाधीश के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए प्रशासनिक आदेश जारी करे, जो मुकदमे की सुनवाई से लेकर फ़ैसले की सुनवाई तक जारी रहेगा क्योंकि जज 30 सितंबर, 2019 को सेवानिवृत्त होने वाले थे।

6 मई को, ट्रायल जज एस के यादव ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर समय बढ़ाने की मांग करते हुए कहा था कि सबूतों की रिकॉर्डिंग भी पूरी नहीं हुई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई के लिए ट्रायल जज को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का इस्तेमाल करना चाहिए।

आदेश में कहा गया,

"हम यह संकेत दे सकते हैं कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध है और इसका उपयोग श्री यादव द्वारा किया जाना चाहिए ताकि सभी साक्ष्य के साथ-साथ आवेदनों को भी पूरा किया जा सके। यह कानून के अनुसार कार्यवाही को नियंत्रित करने के लिए श्री यादव पर निर्भर है ताकि अस केस में और देरी ना हो और केस समय सीमा से बाहर ना निकले।"

दरअसल भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती और 13 अन्य को दिसंबर, 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पीछे आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है।

गौरतलब है कि 19 अप्रैल, 2017 को जस्टिस पीसी घोष और जस्टिस आरएफ नरीमन की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपमुक्त किए जाने के खिलाफ सीबीआई द्वारा दायर अपील की अनुमति देकर आडवाणी, जोशी, उमा भारती और 13 अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ साजिश के आरोपों को बहाल किया था।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए पीठ ने रायबरेली की एक मजिस्ट्रेट अदालत में लंबित अलग मुकदमे को भी स्थानांतरित कर दिया और इसे लखनऊ सीबीआई कोर्ट में आपराधिक कार्यवाही के साथ जोड़ दिया।

शीर्ष अदालत ने मामले में दो साल में दिन-प्रतिदिन सुनवाई कर ट्रायल को समाप्त करने का आदेश दिया था और कहा था कि विशेष जज का ट्रांसफर नहीं होगा। पीठ ने कहा था कि एक आरोपी कल्याण सिंह को राजस्थान के राज्यपाल होने के नाते संवैधानिक प्रतिरक्षा प्राप्त है लेकिन जैसे ही वह पद त्यागते हैं तो उनके खिलाफ अतिरिक्त आरोप दायर किए जाएंगे। 

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