भाइयों की 'राज्य प्रायोजित हत्या' की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर अतीक अहमद की बहन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

Update: 2023-06-27 05:34 GMT

गैंगस्टर-राजनेता अतीक अहमद और अशरफ अहमद की राज्य प्रायोजित हत्या की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर अतीक की बहन ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया। याचिका में रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच की मांग की गई है। साथ ही अतीक के बेटे और उसके भतीजे का पुलिस एनकाउंटर की भी जांच की मांग की गई है। आपको बता दें, 15 अप्रैल को अतीक और अशरफ की यूपी में पुलिस हिरासत में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

एक दूसरी जनहित याचिका वकील विशाल तिवारी की सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसमें अतीक-अशरफ की हत्या की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। साथ ही 2017 के बाद से अभी तक प्रदेश में हुए 183 एनकाउंटरों की भी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की निगरानी में स्वतंत्र जांच करवाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को इन हत्याओं की जांच के लिए उठाए गए कदमों पर एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है। साथ ही अतीक अहमद का बेटा असद सहित उमेश पाल हत्याकांड के अन्य आरोपियों का एनकाउंटर की जांच के बारे में भी जानकारी मांगी है।

अतीक और अशरफ की बहन आयशा नूरी ने एडवोकेट सोमेश चंद्र झा और एडवोकेट अमर्त्य आशीष शरण के माध्यम से याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि ये सभी घटनाएं एक-दूसरे से कुछ ही दिनों के भीतर हुईं। बदला लेने की भावना से उनके परिवार वालों की हत्या की गई, प्रताड़ित किया गया। यूपी पुलिस इन मौतों के लिए जिम्मेदार है।

नूरी ने कहा कि यूपी पुलिस को उत्तर प्रदेश सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त है। उन्हें अतीक के परिवार वालों की हत्या करने और प्रताड़ित करने की पूरी छूट मिली हुई है। अगर इन हत्याओं की स्वंतत्र जांच नहीं की जाएगी तो अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों के जीवन के मैलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। जो भी इन हत्याओं के लिए जिम्मेदार है, उन पर कार्रवाई की जाए।

मार्च में, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने गैंगस्टर से नेता बने अतीक अहमद को राहत देने से इनकार कर दिया, जिन्होंने आशंका जताई थी कि अगर उन्हें गुजरात के साबरमती से प्रयागराज तक की जेल स्थानांतरित किया गया तो उत्तर प्रदेश पुलिस फर्जी मुठभेड़ में मार देगी। समाजवादी पार्टी के पूर्व लोकसभा सदस्य 2005 में बहुजन समाज पार्टी विधायक की हत्या के मुख्य गवाह उमेश पाल की सनसनीखेज हत्या में मुख्य आरोपी थे।

15 अप्रैल को, अतीक को प्रयागराज की नैनी सेंट्रल जेल में स्थानांतरित करने और उत्तर प्रदेश की एक अदालत द्वारा 2007 के उमेश पाल अपहरण मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद, अतीक और उसके भाई, अशरफ को लगभग 10 बजे शहर के एक अस्पताल में मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया जा रहा था। जब मीडिया उनसे सवाल कर रहा था, तीन हमलावर, जो खुद को पत्रकार बताकर मौके पर आए थे, ने अहमद बंधुओं को करीब से गोली मार दी। यह घटना मीडियाकर्मियों के सामने घटी और इसे लाइव कैद कर लिया गया और बाद में समाचार चैनलों पर प्रसारित किया गया, जिससे काफी सार्वजनिक बहस हुई। अतीक के बेटे असद के मुठभेड़ में मारे जाने के दो दिन बाद ही दोनों भाइयों की हत्या कर दी गई थी।

कथित हमलावरों पर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के साथ-साथ शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 3, 7, 25 और 27 और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस बीच, यूपी सरकार ने जांच आयोग अधिनियम, 1952 के तहत मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अरविंद कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में एक न्यायिक आयोग का गठन किया है।

इस चौंकाने वाली घटना के दो सप्ताह से भी कम समय के बाद, एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई जिसमें हत्याओं की स्वतंत्र जांच की मांग की गई, साथ ही 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश राज्य में कथित तौर पर हुई 183 मुठभेड़ों की जांच की मांग की गई। जुलाई 2020 में यूपी के कानपुर जिले के कुख्यात अपराधी, हिस्ट्रीशीटर और गैंगस्टर से नेता बने विकास दुबे की यूपी पुलिस द्वारा मुठभेड़ में हत्या पर सवाल उठाता है। याचिका में तर्क दिया गया कि पुलिस की ऐसी कार्रवाइयां लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा हैं और पुलिस राज्य की ओर ले जाती हैं।

केस

आयशा नूरी बनाम भारत संघ एवं अन्य।



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