हापुड़ मॉब लिंचिंग : SC ने UP सरकार को अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल करने के निर्देश देने से इनकार किया, याचिकाकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट में आवेदन देने को कहा [आर्डर पढ़े]

Update: 2019-05-28 12:50 GMT

उत्तर प्रदेश के हापुड़ में गोहत्या के आरोप में मॉब लिंचिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को ट्रायल कोर्ट में अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल करने के लिए निर्देश देने से इनकार कर दिया है।

"याचिकाकर्ता, ट्रायल कोर्ट के समक्ष करें आवेदन"
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस अनिरूद्ध बोस की वेकेशन बेंच ने हालांकि याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वो इसके लिए ट्रायल कोर्ट को आवेदन दे सकते हैं। दरअसल याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा था कि मृतक कासिम के भाई सलीम और नदीम ने मजिस्ट्रेट के सामने 164 CrPC के तहत बयानों में कई लोगों के नाम लिए हैं जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया। उनका कहना था कि इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट यूपी सरकार को ट्रायल कोर्ट में अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल करने के निर्देश जारी करे।

वहीं पीठ ने राज्य सरकार के उस अनुरोध को भी ठुकरा दिया है, जिसमें यह कहा गया था कि इस मामले की जांच पूरी हो चुकी है लिहाजा वो इस याचिका का निपटारा करे।

इससे पहले 3 मई को मामले की जांच को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने राज्य सरकार को यह निर्देश दिया था कि इस रिपोर्ट को याचिकाकर्ताओं को भी दिया जाए।

गर्मियों की छुट्टियों के बाद सुनवाई की हुई थी मांग
हालांकि इस दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से आग्रह किया कि मामले का ट्रायल 6 महीने में पूरा हो जाएगा इसलिए इसकी सुनवाई गर्मियों की छुट्टियों के बाद की जाए। लेकिन पीठ ने कहा था कि इसको लेकर मई में ही सुनवाई की जाएगी।

उत्तर प्रदेश सरकार से अदालत ने मांगी थी स्टेटस रिपोर्ट
इस मामले में इससे पहले 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को मामले की जांच की ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था।

इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने पीठ को बताया था कि राज्य पुलिस की जांच सहीं नहीं चल रही है और पीड़ितों को मुआवजा तक नहीं दिया गया है।

मामले में पीड़ित के बेटे की याचिका
इससे पहले 11 फरवरी को इस मामले के एक अन्य पीड़ित कासिम के बेटे महताब की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। वृंदा ग्रोवर के माध्यम से दाखिल इस याचिका में इस मामले में उत्तर प्रदेश से बाहर के अधिकारियों की SIT से जांच कराने की मांग की गई थी। पीठ ने मामले के पीड़ित समयद्दीन की याचिका के साथ जोड़ दिया था।

मेरठ रेंज के IG को केस की निगरानी करने का दिया गया था निर्देश
इससे पहले 5 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश जारी किया था कि मेरठ रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (IG) खुद इस केस की सीधी निगरानी करेंगे। तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा था कि इस मामले में IG गलती करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की लिंचिंग को लेकर जारी गाइडलाइन के तहत कार्रवाई करेंगे।

क्या है यह पूरा मामला१
दरअसल उत्तर प्रदेश के हापुड़ में गोहत्या के आरोप में मॉब लिंचिंग के शिकार एक घायल गवाह समयद्दीन ने सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल कर अदालत की निगरानी में विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराने की मांग की थी। इस केस में एक टीवी चैनल में स्टिंग ऑपरेशन भी दिखाया गया था।

इस याचिका में मामले में 4 आरोपी को जमानत मिलने पर जल्द सुनवाई की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि स्थानीय पुलिस ने मॉब लिंचिंग मामले में दिए गए शीर्ष अदालत के फैसले का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है और एफआईआर में पूरी घटना को रोड रेज के रूप में वर्णित किया है।

18 जून 2018 को याचिकाकर्ता समयद्दीन (65) 45 वर्षीय मांस व्यापारी कासिम कुरैशी के साथ थे, जब एक "भीड़" ने गोहत्या के आरोप में उन दोनों पर हमला कर दिया। यह घटना उस दिन के एक दिन बाद हुई जब शीर्ष अदालत ने केंद्र से कहा था कि वो मॉब लिंचिगं के दोषी पाए गए लोगों को दंडित करने के लिए एक अलग कानून तैयार करे।

इस हमले की वीडियो रिकार्डिंग भी की गई जो यह दिखाती है कि कुरैशी और याचिकाकर्ता दोनों को फेंक दिया गया था। हमलावरों ने याचिकाकर्ता की दाढ़ी को भी खींच लिया था, और उससे दुर्व्यवहार किया। कुरैशी की तुरंत मौत हो गई थी। मुख्य अभियुक्त के रूप में पुलिस ने 4 लोगों को गिरफ्तार किया जिनमें एक स्थानीय युधिष्ठिर सिंह सिसोदिया को नामजद किया गया।

बाद में सिसोदिया को जमानत पर छोड़ दिया गया। अपनी जमानत याचिका में उसने यह दावा किया कि वह उस जगह पर मौजूद नहीं था। हालांकि, एक अंग्रेजी समाचार चैनल द्वारा एक स्टिंग ने उसे अपराध के बारे में बताते हुए दिखाया था। समयद्दीन ने भी अपनी याचिका में ट्रायल को उत्तर प्रदेश से बाहर ट्रांसफर करने का आग्रह किया है। वह यह भी चाहते हैं कि शीर्ष अदालत आरोपी की जमानत रद्द करे। सुप्रीम कोर्ट मजिस्ट्रेट के सामने इस घटना पर उनका बयान दर्ज कराए और घटना की स्वतंत्र जांच कराए।


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