अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिला खेलों में भाग लेने से रोकने वाले राज्य के कानूनों को सही ठहराया
मंगलवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने वेस्ट वर्जीनिया और इडाहो राज्यों के उन कानूनों को सही ठहराया, जिनमें महिलाओं और लड़कियों के खेलों में सिर्फ़ बायोलॉजिकल महिलाओं (जन्म से महिला) के भाग लेने की अनुमति है। कोर्ट ने कहा कि ये उपाय 1972 के एजुकेशन अमेंडमेंट्स के 'टाइटल IX' और 14वें संशोधन के 'इक्वल प्रोटेक्शन क्लॉज़' (समान सुरक्षा का प्रावधान) दोनों के अनुरूप हैं।
जस्टिस ब्रेट कवानाघ की लिखी बहुमत वाली राय में कोर्ट ने कहा कि स्कूल बायोलॉजिकल सेक्स के आधार पर महिलाओं और लड़कियों के खेलों के लिए पात्रता तय कर सकते हैं। साथ ही, न तो कोई फ़ेडरल कानून और न ही संविधान राज्यों को यह अनुमति देने के लिए बाध्य करता है कि वे खुद को महिला मानने वाले बायोलॉजिकल पुरुषों को महिला स्पोर्ट्स टीमों में खेलने दें।
इस फ़ैसले ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ़ अपील्स (चौथे और नौवें सर्किट) के उन फ़ैसलों को पलट दिया, जिन्होंने क्रमशः वेस्ट वर्जीनिया और इडाहो में कानूनों को चुनौती देने वाले ट्रांसजेंडर स्टूडेंट्स के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुरूप आगे की कार्यवाही के लिए मामलों को वापस भेज दिया गया।
टाइटल IX सेक्स-आधारित स्पोर्ट्स टीमों की अनुमति देता है
कोर्ट ने कहा कि 1972 में फ़ेडरल फ़ंडिंग वाले शिक्षण संस्थानों में जेंडर-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए लागू किया गया 'टाइटल IX', स्कूलों को पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग एथलेटिक टीमें बनाए रखने की स्पष्ट अनुमति देता है।
टाइटल IX को लागू करने वाले 1975 के नियमों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि वे "हर जेंडर के सदस्यों के लिए अलग-अलग टीमों" को अधिकृत करते हैं, जहां चयन प्रतिस्पर्धी कौशल पर आधारित हो या खेल 'कॉन्टैक्ट स्पोर्ट' (जिसमें खिलाड़ियों के बीच शारीरिक संपर्क होता है) हो। कोर्ट ने माना कि टाइटल IX और इसे लागू करने वाले नियमों में "सेक्स" शब्द का अर्थ बायोलॉजिकल सेक्स है, न कि जेंडर आइडेंटिटी (लिंग पहचान)।
बहुमत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि टाइटल IX स्कूलों को उन बायोलॉजिकल पुरुषों के लिए अपवाद बनाने की आवश्यकता है, जो खुद को महिला मानते हैं और जिन्होंने प्यूबर्टी सप्रेशन (यौवन को रोकने की प्रक्रिया) या हार्मोन ट्रीटमेंट कराया।
कोर्ट ने कहा,
"टाइटल IX, जाविट्स अमेंडमेंट और टाइटल IX नियमों का टेक्स्ट यह नहीं कहता (या इसका संकेत भी नहीं देता) कि स्कूलों को कुछ बायोलॉजिकल पुरुषों को महिलाओं और लड़कियों के खेलों में भाग लेने की अनुमति देनी चाहिए।"
कोर्ट ने आगे कहा कि बायोलॉजिकल सेक्स के आधार पर अलग-अलग स्पोर्ट्स टीमें बनाए रखना एक "उचित" नियामक विकल्प है, क्योंकि पुरुषों और महिलाओं के बीच स्वाभाविक शारीरिक अंतर होते हैं और एथलेटिक्स में सुरक्षा और प्रतिस्पर्धी निष्पक्षता से जुड़ी चिंताएँ होती हैं।
'इक्वल प्रोटेक्शन' (समान सुरक्षा) की चुनौती खारिज
संवैधानिक चुनौती पर विचार करते हुए कोर्ट ने माना कि वेस्ट वर्जीनिया और इडाहो के कानून 'इक्वल प्रोटेक्शन क्लॉज़' के तहत सेक्स-आधारित वर्गीकरण पर लागू होने वाली 'इंटरमीडिएट स्क्रूटनी' (मध्यम स्तर की जांच) की कसौटी पर खरे उतरते हैं। कोर्ट के अनुसार, महिला एथलीटों की सुरक्षा और खेल में निष्पक्षता सुनिश्चित करने में राज्यों के महत्वपूर्ण सरकारी हित शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा,
"राज्यों का सेक्स-आधारित वर्गीकरण—जिसमें महिलाओं और लड़कियों के खेल को जैविक रूप से महिलाओं तक सीमित किया गया—इन हितों से काफी हद तक जुड़ा हुआ है।"
कोर्ट ने उस तर्क को खारिज कर दिया कि राज्यों को ट्रांसजेंडर एथलीटों को महिला खेलों से बाहर करने से पहले हार्मोन ट्रीटमेंट या प्यूबर्टी ब्लॉकर्स के असर के आधार पर उनका अलग-अलग मूल्यांकन करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि हर ट्रांसजेंडर एथलीट की शारीरिक क्षमताओं की तुलना जैविक पुरुषों और महिलाओं से करने के लिए अदालतों को कहना "लगभग असंभव काम" होगा और ऐसी नीतिगत बातें तय करने के लिए विधायिका और शिक्षण संस्थान ज़्यादा उपयुक्त हैं।
कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि ये कानून ट्रांसजेंडर होने के आधार पर भेदभाव करते हैं; कोर्ट ने कहा कि ये कानून प्रतिभागियों को जेंडर आइडेंटिटी के बजाय जैविक सेक्स के आधार पर वर्गीकृत करते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर इन्हें ट्रांसजेंडर वर्गीकरण माना भी जाए तो भी ये कानून संवैधानिक जांच में खरे उतरेंगे, क्योंकि इनमें राज्यों की सुरक्षा और खेल में निष्पक्षता से जुड़े हित शामिल हैं।
चल रही साइंटिफिक बहस
कोर्ट ने कहा कि यह मेडिकल और साइंटिफिक सवाल कि क्या हार्मोन ट्रीटमेंट मेल बायोलॉजी से जुड़े फिजिकल फायदे खत्म कर देता है, अभी भी लगातार बहस का विषय बना हुआ है।
इसने बताया कि इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी, अमेरिकी ओलंपिक और पैरालंपिक कमेटी और NCAA समेत कई एथलेटिक बॉडीज़ ने हाल ही में कॉम्पिटिशन में फेयरनेस और सेफ्टी की चिंताओं का हवाला देते हुए महिलाओं के स्पोर्ट्स में सिर्फ बायोलॉजिकल महिलाओं की हिस्सेदारी को सीमित करने वाली पॉलिसी अपनाई हैं। कोर्ट ने कहा कि जहां ऐसी मेडिकल और साइंटिफिक अनिश्चितता मौजूद है, वहां लेजिस्लेचर को पॉलिसी चुनने में काफी छूट दी जाती है।
कोर्ट ने स्टूडेंट एथलीट्स के प्रति सम्मान की अपील की
राज्य के कानूनों को बनाए रखते हुए कोर्ट ने उन ट्रांसजेंडर स्टूडेंट्स की इच्छाओं को माना जो स्कूल स्पोर्ट्स में हिस्सा लेना चाहते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"इस मुद्दे के किसी भी तरफ का कोई भी स्टूडेंट-एथलीट, चाहे वह बायोलॉजिकल महिला हो या ट्रांसजेंडर, अलग-थलग या बदनाम होने का हकदार नहीं है।"
साथ ही कहा कि बायोलॉजिकल महिला एथलीट और ट्रांसजेंडर स्टूडेंट्स दोनों सम्मान के हकदार हैं।
जस्टिस क्लेरेंस थॉमस और जस्टिस नील गोरसच ने अलग-अलग सहमत राय लिखीं। जस्टिस सोनिया सोटोमेयर ने कुछ सहमति और कुछ असहमति जताते हुए अपनी राय दी, जिसमें जस्टिस एलेना कगन और केतनजी ब्राउन जैक्सन भी शामिल हुए, जबकि जस्टिस जैक्सन ने भी अलग से आंशिक सहमति और असहमति लिखी।
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