कपिल सिब्बल ने 10वीं अनुसूची के तहत 'विलय' के मुद्दे पर फ़ैसला लेने में सुप्रीम कोर्ट की देरी पर उठाए सवाल
सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत विलय से जुड़े अपवाद (Merger Exception) पर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच के 2022 के फ़ैसले की वैधता तय करने में सुप्रीम कोर्ट की देरी पर सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी दी कि मूल राजनीतिक पार्टी के विलय के बिना किसी विधायी पार्टी (legislature party) के विलय को मान्यता देने से "गड़बड़ी" (mischief) पैदा होगी।
कोच्चि में 'हॉर्स ट्रेडिंग और लोकतंत्र' (Horse Trade and Democracy) पर ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन द्वारा आयोजित चर्चा में बोलते हुए सिब्बल ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र और दलबदल विरोधी कानून (anti-defection law) के लिए महत्वपूर्ण असर होने के बावजूद, यह संवैधानिक सवाल 2022 से अनसुलझा पड़ा है।
बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने माना था कि 10वीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत विलय का अपवाद तब लागू होगा, जब किसी विधायी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर लें, भले ही मूल राजनीतिक पार्टी का विलय न हो। यह फ़ैसला तब आया था, जब कोर्ट ने माना कि बीजेपी में शामिल होने वाले गोवा कांग्रेस विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि 2/3 विधायक [15 में से 10 कांग्रेस विधायक] बीजेपी में शामिल हो गए थे, जिससे उनका यह कदम 'विलय' बन गया।
उन्होंने बताया कि इस नज़ीर (Precedent) का हवाला तब दिया गया, जब अप्रैल 2026 में AAP के 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हुए और 'विलय अपवाद' का दावा किया, जबकि AAP और BJP राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बने हुए हैं। इसी तरह, जून 2026 मे शिवसेना UBT के 6 सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए और स्पीकर ने इसे 'विलय' के रूप में मान्यता दी।
इस व्याख्या की सही-गलत जांच करने में सुप्रीम कोर्ट की देरी पर सवाल उठाते हुए सिब्बल ने कहा:
"मुझे हैरानी है कि 2022 से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई क्यों नहीं की? अगर आप किसी ऐसे अहम संवैधानिक मुद्दे पर फ़ैसला नहीं करते जो हमारे लोकतंत्र के भविष्य पर असर डालता है तो हमें यह सवाल पूछना होगा: आपने फ़ैसला क्यों नहीं किया? इसकी क्या वजह है?"
गोवा बेंच की व्याख्या को चुनौती देते हुए 2022 में दायर स्पेशल लीव पिटिशन (SLP(c) No.5305/2022) को 2026 में बेकार मानकर बंद कर दिया गया, क्योंकि संबंधित गोवा विधानसभा का कार्यकाल 2022 में ही खत्म हो गया। 2022 के गोवा विधानसभा चुनावों के बाद भी ऐसा ही हुआ, जब कांग्रेस के 11 में से 8 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए। हाईकोर्ट ने भी 2025 में इसे विलय (merger) माना और इसे चुनौती देने वाली याचिका अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
'विधायी दलों के विलय को मान्यता देने से गड़बड़ी होगी'
सिब्बल ने दसवीं अनुसूची के पैरा 4(ii) की व्याख्या की आलोचना की, जिसके तहत विलय का अपवाद तब लागू होता है, जब किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय करने पर सहमत होते हैं।
सिब्बल के अनुसार, मूल राजनीतिक दल के विलय की आवश्यकता के बिना केवल विधायी दल के विलय को पर्याप्त मानने से अपवाद ही नियम पर हावी हो जाएगा।
उन्होंने कहा,
"तब दसवीं अनुसूची एक ऐसा कानून बन जाती है, जो अकेले दल बदलने वाले को दंडित करती है और संगठित रूप से दल बदलने वालों को पुरस्कृत करती है।"
उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान का उद्देश्य वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन की रक्षा करना था, लेकिन इसके बजाय यह बड़े पैमाने पर दल-बदल का जरिया बन गया।
सिब्बल ने कहा,
"दसवीं अनुसूची को खत्म करने की जरूरत नहीं है। इसका वही अर्थ होना चाहिए, जिसके लिए इसे बनाया गया। पैरा 4 को पढ़ा जाना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो उसमें संशोधन किया जाना चाहिए ताकि विलय राजनीतिक दलों का विलय हो, न कि विधायकों का सामूहिक रूप से बाहर निकलना।"
उन्होंने कहा कि विलय के प्रावधान को न्यायिक व्याख्या या विधायी संशोधन के माध्यम से सुधारा जाना चाहिए और कानूनी बिरादरी से आग्रह किया कि वे "इस चलन को कानूनी भाषा में सही न ठहराएं"।
उन्होंने कहा,
"लोकतंत्र असहमति को तो झेल सकता है, लेकिन जनादेश की बिक्री को नहीं झेल सकता।"
उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि जब तक प्रावधान में सुधार नहीं किया जाता, तब तक दसवीं अनुसूची उस उद्देश्य के स्मारक के रूप में बनी रहेगी जिसे वह अब पूरा नहीं करती है।
सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी उस रिट याचिका का भी जिक्र किया, जिसमें दसवीं अनुसूची की उस व्याख्या को चुनौती दी गई, जो दल-बदल को विलय मानने की अनुमति देती है। इस याचिका पर जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच सुनवाई कर रही है।
उन्होंने कहा,
"मैंने पहली बार खुद कोई याचिका दायर की। जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस अराधे की बेंच ने नोटिस जारी किया और कहा कि दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) में बहुत सारी गंभीर समस्याएं हैं। यह बात असलियत को कम करके बताने जैसी है।"
सिब्बल ने कहा कि मामला सिर्फ़ राज्य सरकारों के भविष्य तक सीमित नहीं है; उन्होंने चेतावनी दी कि दल-बदल का इस्तेमाल लोकसभा में भी संख्या बल बदलने के लिए किया जा सकता है।
सिब्बल ने संविधान संशोधन पास करने के लिए ज़रूरी संसदीय बहुमत की संभावना का ज़िक्र किया, जिसे उन्होंने "स्पेशल मेजॉरिटी ज़ोन" (विशेष बहुमत का दायरा) कहा और "मिशन 362" का ज़िक्र किया।
उन्होंने कहा,
"अगर वे 362 के आंकड़े तक पहुँच जाते हैं तो वे संविधान में बदलाव कर सकते हैं; वे संविधान के 'बेसिक स्ट्रक्चर' (मूल ढांचे) की अवधारणा को बदल सकते हैं; वे संविधान के उस धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बदल सकते हैं जिसे हमने 1950 में अपनाया था।"
उन्होंने आगे कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे और यह हर नागरिक को प्रभावित करेगा, भले ही आम लोग यह न समझ पाएं कि अगर संसद में ऐसा बहुमत मिल जाए तो क्या हो सकता है।
'हॉर्स-ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) संवैधानिक संकट'
सिब्बल ने हॉर्स-ट्रेडिंग को "चुने हुए प्रतिनिधियों की संगठित खरीद" बताया, ताकि चुनाव के बाद बनाया गया बहुमत, जनता द्वारा चुने गए बहुमत की जगह ले ले।
उन्होंने कहा कि इसमें नकद पैसे, मंत्री पद, जाँच से सुरक्षा और अन्य लाभ शामिल हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप होने वाले दल-बदल को कभी-कभी वैध राजनीतिक विलय के रूप में पेश किया जाता है।
उन्होंने कहा,
"नागरिक एक जनादेश के लिए वोट करते हैं, लेकिन सत्ता किसी और को मिल जाती है।"
उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी प्रथाएं जनता के भरोसे को एक बिकाऊ चीज़ बना देती हैं।
उन्होंने कहा कि हॉर्स-ट्रेडिंग एक संवैधानिक संकट है, जो प्रतिनिधि सरकार, जनता के जनादेश की अखंडता और संसदीय लोकतंत्र के मूल ढांचे पर प्रहार करता है।
भारत में दल-बदल के इतिहास का ज़िक्र करते हुए सिब्बल ने 1967 के लोकसभा प्रस्ताव के बाद गठित 'दल-बदल पर समिति' की रिपोर्ट का हवाला दिया। समिति ने फरवरी 1969 में रिपोर्ट दी थी कि दल-बदल के 542 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से लगभग 80% मामले मार्च 1967 के बाद के 12 महीनों में हुए। उन्होंने कहा कि बाद में दल-बदल करने वाले 116 लोगों को मंत्री पद से नवाज़ा गया।
अयोग्यता के मामलों पर फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र ट्रिब्यूनल की मांग
सिब्बल ने दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर फ़ैसला लेने में स्पीकर की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा,
"भारत में स्पीकर उस राजनीतिक पार्टी से जुड़ा रहता है जिसने उसे चुना है। उसकी निष्पक्षता पर हमेशा शक बना रहेगा।"
उन्होंने अयोग्यता के मामलों पर फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र ट्रिब्यूनल बनाने और ऐसे फ़ैसलों के लिए समय-सीमा तय करने की मांग की।
सिब्बल ने कहा कि बहुमत बनाने की प्रक्रिया में जांच एजेंसियां, राज्यपाल, स्पीकर और कभी-कभी अदालती कार्यवाही का समय भी शामिल हो सकता है।
उन्होंने टिप्पणी की,
"लोकतंत्र शोर-शराबे वाली राजनीति को तो झेल सकता है, लेकिन इस सोच को नहीं झेल सकता कि हर संस्था एक ही शतरंज की बिसात का मोहरा है।"
सिब्बल ने आगे कहा कि कैश, पद, कॉन्ट्रैक्ट या जांच रद्द करने जैसे लालच को आम राजनीतिक बातचीत नहीं, बल्कि वोटरों के जनादेश के साथ भ्रष्टाचार माना जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,
"लालच - जैसे कैश, पद, कॉन्ट्रैक्ट या जांच रद्द करना - को वोटरों के जनादेश के साथ भ्रष्टाचार माना जाना चाहिए, न कि राजनीति में आम लेन-देन। संसद ऐसा कर सकती है, लेकिन वह करेगी नहीं। कोर्ट कम-से-कम ऐसी व्याख्या को मानने से इनकार कर सकता है जिससे अपवाद ही नियम को खत्म कर दे।"
इस कार्यक्रम का वीडियो यहां देखा जा सकता है।
Author are Debby Jain & Gursimran Kaur Bakshi.