अदालतों में AI के इस्तेमाल के लिए 2026 के ड्राफ्ट नियमों में जवाबदेही का विश्लेषण और सुझाव

Update: 2026-06-17 15:00 GMT

नए ड्राफ्ट नियम: एक अहम कदम

भारतीय अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को शामिल करना अब कोई दूर की बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने "अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल के लिए नियम (2026)" पेश करके एक अहम कदम उठाया। भारतीय न्याय व्यवस्था पर अभी मामलों का जो भारी बोझ है, उसे देखते हुए AI को अपनाना बहुत ज़रूरी है।

यहां नियम 4 "इंसानी प्राथमिकता" की बात करता है, जिसका मतलब है कि AI का इस्तेमाल सिर्फ़ उन कामों के लिए किया जाना चाहिए, जो मदद करने वाले हों और इसे इंसानी फ़ैसले के अधीन रहना चाहिए। यह यह भी मानता है कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) "हैलुसिनेट" (गलत जानकारी देना) कर सकते हैं, यानी वे भरोसेमंद लग सकते हैं लेकिन जो नतीजा निकलता है, वह असल में एक अपरिहार्य तकनीकी गलती का नतीजा होता है।

साथ ही यह "पब्लिक डेटा सॉवरेनिटी" (सार्वजनिक डेटा पर अधिकार) के सिद्धांत को भी ध्यान में रखता है, जिसका मतलब है कि टेक्नोलॉजी का प्रोवाइडर/वेंडर सार्वजनिक न्यायिक डेटा का इस्तेमाल करने के बाद मॉडल पर अपनी बौद्धिक संपदा (intellectual property) का दावा नहीं कर सकता। इसके अलावा, नियम 39, जो AI से जुड़ी घटनाओं का डेटाबेस बनाने की बात करता है, बेहतर मैनेजमेंट जैसा लगता है, क्योंकि AI सिस्टम अक्सर एक ही तरह की गलतियां करते हैं; इन घटनाओं को रिकॉर्ड करके दूसरे मॉडल और अलग-अलग अदालतों के साथ शेयर करने से प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी।

हालांकि, अच्छे कानूनों के लिए सिर्फ़ अच्छी नीयत काफ़ी नहीं है। अगर बारीकी से देखें तो इस ड्राफ्ट में एक बड़ा विरोधाभास है। नियम अदालतों में AI के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं, लेकिन फिर वे अधिकारियों को "AI से जुड़ी घटनाओं" के लिए व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार ठहराते हैं, यहां तक कि उन घटनाओं के लिए भी जिनका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता था या जो इस्तेमाल की गई टेक्नोलॉजी की वजह से अपरिहार्य हैं।

जैसे, सोचिए कि कोई कानूनी रिसर्च के लिए AI टूल का इस्तेमाल कर रहा है और अगर AI मॉडल कोई नकली केस या रद्द किया गया फ़ैसला दिखाता है तो नियम 3(z) के अनुसार यह "हैलुसिनेशन" है। इस ड्राफ्ट के साथ अधिकारियों को "बिना किसी गलती के भी" (no-fault liability) ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है; सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर होगी। तो, जब कोई मशीन गलती करती है और नुकसान पहुँचाती है, तो कौन भुगतान करेगा?

विचार करने के लिए मुख्य मुद्दे

सख्त इंसानी जवाबदेही मॉडल:

ड्राफ्ट का नियम 8 साफ़ तौर पर कहता है कि AI की मदद से लिए गए हर फ़ैसले की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से अधिकारी की होगी। यह नियम किसी व्यक्ति को तीन तरह के बचाव (defenses) लेने से रोकता है।

(a) AI से बने आउटपुट

(b) "ब्लैक बॉक्स" की अस्पष्टता

(c) एल्गोरिदम का मतिभ्रम (hallucination), जहां फैसला नुकसानदायक, गैर-कानूनी या गलत होता है।

इसके अलावा, रेगुलेशन 43(6) इस मानक को मुक़दमेबाज़ों और वकीलों पर भी लागू करता है, जिन्हें भी बचाव के तौर पर इन तकनीकी सीमाओं का हवाला देने से रोका गया। इसलिए उन्हें 'बिना गलती के दायित्व' (no-fault liability) का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इसी तरह ये प्रावधान अधिकारियों, मुक़दमेबाज़ों और वकीलों के लिए सख्त दायित्व व्यवस्था (strict liability regime) बनाते हैं। साथ ही उन्हें कोर्ट द्वारा मंज़ूर AI मॉडल की गलतियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, और जहां "उचित सावधानी" बरतना भी मान्य बचाव नहीं माना जाता है।

यह रेगुलेटरी ढांचा भारत के संविधान के आर्टिकल 14 के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करता है, जो मनमाने सरकारी कामकाज पर रोक लगाता है। सुप्रीम कोर्ट ने ई.पी. रॉयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) 4 SCC 3 मामले में कहा था कि "मनमानेपन और समानता के बीच कोई तालमेल नहीं हो सकता।" अगर किसी अधिकारी को न्यायपालिका द्वारा मंज़ूर किसी ऐसी "एल्गोरिदम की कमी" के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिसे टाला नहीं जा सकता था, और जहां सभी उचित सावधानियां बरती गई थीं, तो बिना किसी गलती के दायित्व थोपना "साफ़ तौर पर" मनमाना लगता है। ऐसी स्थितियों में इन नियमों के तहत व्यक्तियों को उन जोखिमों के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जाने का खतरा है, जो पूरी तरह से उनके नियंत्रण से बाहर हैं।

इसके अलावा, संविधान का आर्टिकल 21 न केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया की मांग करता है, बल्कि "कानून की उचित प्रक्रिया" (due process of law) की सख्त ज़रूरत पर भी ज़ोर देता है, जैसा कि मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) 1 SCC 248 मामले में कहा गया; इन नियमों के तहत कोई न्यायिक अधिकारी मंज़ूर AI मॉडल पर ईमानदारी से काम कर सकता है। फिर भी ऐसी गलती के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है, जिसका पता नहीं लगाया जा सका, जिससे उचित प्रक्रिया पर सवाल उठता है। असल में, मुक़दमेबाज़ों को नतीजे भुगतने के लिए मजबूर होना पड़ता है; एल्गोरिदम की विफलता के कारण मुक़दमेबाज़ को न्याय तक अपनी पहुंच से समझौता करना पड़ता है।

रेगुलेशन 3(n) के तहत "ब्लैक बॉक्स" को एक ऐसे AI सिस्टम के तौर पर परिभाषित किया गया, जिसके नतीजे का पता नहीं लगाया जा सकता। इस अस्पष्टता को रेगुलेशन 7(3) में साफ़ तौर पर माना गया, जिसमें ज़्यादा जांच-पड़ताल की मांग की गई। हालांकि, रेगुलेशन 8(1) के तहत कोई न्यायिक अधिकारी अस्पष्टता का बचाव नहीं ले सकता। इसलिए व्यावहारिक तौर पर ड्राफ्ट यह मानता है कि AI मॉडल को पूरी तरह से समझा नहीं जा सकता, फिर भी यह इंसानी अधिकारियों पर ही पूरी ज़िम्मेदारी डालता है।

यह सिस्टम एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987) 1 SCC 395 मामले में तय की गई ज़िम्मेदारी से जुड़े पुराने नियमों के सीधे खिलाफ है; "एब्सोल्यूट लायबिलिटी" (पूरी ज़िम्मेदारी) का सिद्धांत उन संस्थाओं के लिए बनाया गया, जो खतरनाक कामों से फ़ायदा उठाती हैं। एब्सोल्यूट लायबिलिटी के सिद्धांत के अनुसार, अदालतों द्वारा मंज़ूरी दिए गए एल्गोरिदम मॉडल की गलतियों के लिए किसी न्यायिक अधिकारी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जब नुकसान का कारण "ब्लैक बॉक्स" (ऐसी प्रणाली जिसे समझना मुश्किल हो) में छिपा हो और अधिकारी खुद सिस्टम की ठीक से जांच करने में सक्षम न हो, तो ऐसे अधिकारियों पर पूरी ज़िम्मेदारी डालने से जवाबदेही सिर्फ़ एक "कानूनी कल्पना" (fictio juris) बनकर रह जाती है।

"ज़िम्मेदारी का खालीपन": जवाबदेही जिसमें असरदार उपाय नहीं

रेगुलेशन 8 कहता है कि अगर कोई अधिकारी AI का इस्तेमाल करते हुए गलती करता है, तो ज़िम्मेदारी उसी की होगी। एल्गोरिदम की गलती के लिए आप AI को दोष नहीं दे सकते, या यह नहीं कह सकते कि यह "ब्लैक बॉक्स" या "हैलुसिनेटेड" (AI द्वारा गलत जानकारी बनाना) नतीजा था। फिर रेगुलेशन 43(6) आता है, जो दस्तावेज़ों और सबूतों के बारे में है; अगर आप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बना कोई नकली या गलत दस्तावेज़ जमा करते हैं, तो ज़िम्मेदारी उसी व्यक्ति की होगी। AI का आउटपुट कोई बहाना नहीं हो सकता। ऐसा लगता है कि AI से बने नतीजों के लिए सख़्त ज़िम्मेदारी (strict liability) का नियम है।

हालांकि, अजीब बात यह है कि ज़िम्मेदारी तय करने के लिए सज़ा देने के तरीके के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया। इसी तरह रेगुलेशन 20 और 46 भी यह साफ़ करते हैं कि AI के इस्तेमाल के लिए कौन ज़िम्मेदार है, लेकिन सज़ा देने के लिए कोई ठोस गाइडलाइन नहीं बनाई गई।

डिजिटल अंतर और न्याय तक पहुंच

ड्राफ्ट रेगुलेशन का रेगुलेशन 13 दोहराता है कि "AI सिस्टम को सबको साथ लेकर चलने (inclusivity) को बढ़ावा देना चाहिए, न्याय तक समान पहुंच बढ़ानी चाहिए और डिजिटल अंतर को पैदा या बढ़ाना नहीं चाहिए"। यह सोच अनीता कुशवाहा बनाम पुष्प सूदन (2016) 8 SCC 509 मामले के बाद संवैधानिक रूप से मज़बूत हुई, जिसमें "न्याय तक पहुंच को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अहम हिस्सा माना गया" (पैरा 29)।

हालांकि, इन ड्राफ्ट रेगुलेशन को लागू करने के लिए कोई ठोस तरीका नहीं बताया गया। इन ड्राफ़्ट नियमों में AI-की मदद से होने वाली अदालती प्रक्रियाओं की कल्पना की गई, जिसमें डिजिटल फ़ाइलिंग और ऑनलाइन शेड्यूलिंग शामिल हैं। इन सबके लिए देश के हर नागरिक के पास डिजिटल एक्सेस, डिवाइस का मालिकाना हक, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल जानकारी होनी ज़रूरी है। हालांकि, भारत में डिजिटल अंतर (digital divide) काफ़ी ज़्यादा है; ग्रामीण और शहरी इलाकों में इंटरनेट की पहुंच क्रमशः 37% और 67% है (NSSO के डेटा के अनुसार), और बुज़ुर्गों, महिलाओं और समाज के हाशिए पर रहने वाले समूहों में डिजिटल साक्षरता काफ़ी कम है।

हालांकि, इन नियमों के पीछे की सोच बड़ी है, लेकिन इन्हें अंतिम रूप देने से पहले मौजूदा कानूनी कमियों को दूर करना ज़रूरी है। इसलिए सबसे पहली बात यह है कि जब कोई अधिकारी अथॉरिटी द्वारा मंज़ूर किए गए AI सिस्टम का इस्तेमाल करता है, बिना किसी लापरवाही के ईमानदारी से काम करता है, और तय प्रक्रियाओं का पालन करता है तो उसे ज़िम्मेदारी से बचाया जाना चाहिए। एल्गोरिदम की गलतियों (AI से जुड़ी घटनाओं) के लिए उन पर सज़ा या जुर्माना नहीं लगाया जाना चाहिए। ऐसी सुरक्षा "Actus non facit Reum nisi mens sit rea" (सिर्फ़ नतीजों के आधार पर नहीं, बल्कि गलती के आधार पर ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए) के सिद्धांत के अनुरूप है। अगर इस सुरक्षा उपाय को लागू नहीं किया गया तो मनमानी हो सकती है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

दूसरी बात, जब कोर्ट द्वारा मंज़ूर किया गया AI सिस्टम गलत नतीजे देता है तो AI सचिवालय और मंज़ूरी देने वाली अथॉरिटी, दोनों को ही बड़ी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। ड्राफ़्ट में संयुक्त ज़िम्मेदारी तय करने वाला एक साफ़ प्रावधान शामिल होना चाहिए।

तीसरी बात, रेगुलेशन के चैप्टर VI के तहत वेंडर्स को दी गई छूट (immunity) व्यक्तिगत अधिकारियों तक भी बढ़ाई जानी चाहिए। अगर किसी खराब सिस्टम की वजह से अधिकारियों पर ज़िम्मेदारी आती है तो वेंडर्स पर भी संयुक्त और अलग-अलग (joint and several) ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। अधिकारियों की ज़िम्मेदारी वेंडर्स की ज़िम्मेदारी के बराबर होनी चाहिए।

चौथी बात, रेगुलेशन 52 के तहत शिकायत निवारण तंत्र को यह देखना चाहिए कि क्या इसका इस्तेमाल तय दायरे से बाहर तो नहीं हो रहा है। अभी, इस फ़्रेमवर्क में कोर्ट द्वारा अधिकृत AI टूल्स से बुरी तरह प्रभावित होने वाले मुक़दमेबाज़ों के लिए कोई कानूनी उपाय नहीं है। यह स्थिति मुक़दमेबाज़ों पर भेदभावपूर्ण और अनुचित नतीजे डालती है, क्योंकि इस सिस्टम का मूल मकसद न्याय तक पहुंच को बढ़ावा देना है। इसे न केवल संस्थानों की, बल्कि अधिकारियों, मुक़दमेबाज़ों और वकीलों की भी सुरक्षा करनी चाहिए जो कानूनी सिस्टम पर निर्भर हैं।

आखिर में भारतीय अदालतों, खासकर ज़िला अदालतों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी न्यायिक व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करने में एक बड़ी बाधा है। इनमें से ज़्यादातर अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं, इसलिए यह उम्मीद करना बहुत ज़्यादा होगा; इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने और ट्रेनिंग वगैरह की ज़रूरत होगी।

लेखक- आरुषि मेश्राम और आलोक कुमार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।

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