कोर्ट ने नई पीढ़ी को निराश किया है: सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने एक लेख में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत ने नई पीढ़ी को निराश किया। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत ने कथित पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे छात्रों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
दवे ने लिखा कि संविधान का अनुच्छेद 32 सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक बनाता है। उन्होंने संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर के उस वक्तव्य का उल्लेख किया, जिसमें अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा और हृदय बताया गया।
लेख में दवे ने सवाल किया कि यदि हजारों छात्रों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप है, तो सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? उन्होंने 22 जुलाई की सुनवाई का जिक्र करते हुए कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि अदालत के पास वीडियो देखने का समय नहीं है।
दवे ने लिखा कि अदालत का यह रवैया उसके संवैधानिक दायित्वों से दूरी का संकेत देता है। उन्होंने पूछा कि क्या अदालत अब सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है।
लेख में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई पुराने फैसलों में स्वयं को मौलिक अधिकारों का संरक्षक बताया है। उन्होंने रोमेश थापर, दरयाव, और रामशरण औत्यनुप्रासी जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने पहले यह सिद्धांत स्थापित किया कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में तकनीकी बाधाओं को दरकिनार कर राहत दी जानी चाहिए।
दवे ने यह भी कहा कि जब न्यायपालिका या उसके सदस्यों के अधिकारों का प्रश्न उठा, तब सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप किया। उन्होंने नडियाद के मजिस्ट्रेट से जुड़े मामले और 1994 में इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर की घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि उन मामलों में अदालत ने तत्काल प्रभावी आदेश पारित किए।
उन्होंने आरोप लगाया कि जहां एक ओर अदालत ने न्यायपालिका पर आधारित NCERT की पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय पर त्वरित सुनवाई करते हुए प्रकाशन रोकने और अधिकारियों के निलंबन तक के निर्देश दिए, वहीं छात्रों की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर मुद्दे पर तत्काल सुनवाई नहीं की।
दवे ने देश की शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए और कहा कि इसमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है। उनके अनुसार बार-बार होने वाली परीक्षा अनियमितताओं ने हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया और युवाओं में बेरोजगारी भी गंभीर चिंता का विषय है।
लेख के अंत में दवे ने कहा कि देश लोकतंत्र, संविधान, संवैधानिक मूल्यों और कानून के शासन की रक्षा के लिए न्यायपालिका की ओर उम्मीद से देख रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि न्यायपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगी।
(यह सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे द्वारा लिखे गए लेख में व्यक्त विचार हैं।)