"TMC के बागी गुट के पास सबसे ज़्यादा संख्या बल": हाईकोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष के रूप में रिताब्रत बनर्जी की नियुक्ति को सही ठहराया

Update: 2026-06-18 15:07 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को वरिष्ठ तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय को अंतरिम राहत देने से इनकार किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर विरोधी गुट के नेता रिताब्रत बनर्जी की नियुक्ति को चुनौती दी। कोर्ट ने कहा कि रोक (इंजंक्शन) लगाने के लिए कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। (2026 LiveLaw (Cal) 251)

जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) विधायक दल के बहुमत ने स्पीकर के सामने विरोधी दावेदार का समर्थन किया। साथ ही चट्टोपाध्याय जिस प्रस्ताव पर भरोसा कर रहे थे, उस पर ही जाली हस्ताक्षर के आरोपों के कारण संदेह था, जिनकी अभी पुलिस जांच चल रही है। कोर्ट ने माना कि इन हालात में याचिकाकर्ता अंतरिम सुरक्षा का हकदार नहीं है।

"कोर्ट को याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए अंतरिम आदेश के लिए कोई प्रथम दृष्टया मामला या सुविधा-असुविधा का संतुलन याचिकाकर्ता के पक्ष में नहीं मिला। इसलिए अंतरिम आदेश देने से इनकार किया जाता है।"

मामले की पृष्ठभूमि

बालीगंज से चुने गए विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने दावा किया कि 6 मई, 2026 को हुई AITC विधायक दल की बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से नेता प्रतिपक्ष के तौर पर नामित किया गया और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ने औपचारिक रूप से उनका नाम स्पीकर को भेजा था।

हालांकि, स्पीकर के इस सिफारिश पर कार्रवाई करने से पहले कुछ विधायकों ने आपत्तियां उठाईं और आरोप लगाया कि प्रस्ताव पर कई हस्ताक्षर जाली थे। शुरुआती जांच के बाद स्पीकर के कार्यालय ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद FIR दर्ज की गई।

इसके बाद 80 AITC विधायकों में से 58 ने स्पीकर के सामने संयुक्त पत्र सौंपा, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर एक अन्य नेता का समर्थन किया गया। हालांकि उस नेता को बाद में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निकाल दिया गया, लेकिन उन्होंने सिविल कोर्ट में इस निष्कासन को चुनौती दी और अंतरिम रोक (स्टे) हासिल की।

इसके बाद चट्टोपाध्याय ने हाईकोर्ट का रुख किया और मांग की कि रिट याचिका के निपटारे तक नए मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष और मुख्य सचेतक को काम करने से रोका जाए।

कोर्ट की टिप्पणियां

कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता जिस प्रस्ताव पर भरोसा कर रहा है, उससे जुड़े गंभीर विवाद है। कोर्ट ने देखा कि AITC के नेशनल जनरल सेक्रेटरी ने चट्टोपाध्याय की नियुक्ति की सिफारिश करने वाला एक प्रस्ताव भेजा, लेकिन हस्ताक्षरों की असलियत पर उठने वाले सवालों के कारण स्पीकर के ऑफिस को दस्तावेजों की जांच करनी पड़ी और मामले को पुलिस के पास जांच के लिए भेजना पड़ा।

जस्टिस राव ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि AITC के 80 चुने हुए विधायकों में से 58 ने बाद में स्पीकर से संपर्क करके दूसरे दावेदार के लिए बहुमत का समर्थन होने का दावा किया और उनमें से 56 विधायक खुद स्पीकर के सामने पेश हुए।

विपक्ष के नेता की मान्यता तय करने वाले कानूनी नियमों पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा:

"इस प्रावधान के अनुसार, उस समय विपक्ष की जिस पार्टी के पास सबसे ज़्यादा संख्या बल होता है, वही पार्टी विपक्ष के नेता का फैसला करती है। इस मामले में AITC के 80 चुने हुए विधायकों में से 58 सदस्यों ने संयुक्त अनुरोध सौंपकर और खुद स्पीकर के सामने पेश होकर सबसे ज़्यादा संख्या बल दिखाया। AITC के नेशनल जनरल सेक्रेटरी द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव... विवाद का विषय है।"

कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि स्पीकर ने न केवल हस्ताक्षरों से जुड़े विवाद पर विचार किया, बल्कि इस बात पर भी ध्यान दिया कि दूसरे दावेदार को पार्टी से निकाले जाने के फैसले पर एक सिविल कोर्ट ने रोक लगाई।

स्पीकर के आदेश का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा:

"स्पीकर ने जांच की और पाया कि AITC के नेशनल जनरल सेक्रेटरी द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव... उस प्रस्ताव में मौजूद हस्ताक्षरों को लेकर विवाद है और पार्टी से निकाले जाने का नोटिस... भी चुनौती के दायरे में है।"

पिटीशनर का सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा

चट्टोपाध्याय ने सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के गवर्नर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहुत ज़्यादा भरोसा किया। साथ ही कहा कि दसवें शेड्यूल के तहत लीडरशिप और व्हिप से जुड़े मामलों में पॉलिटिकल पार्टी को – सिर्फ़ लेजिस्लेचर की मेजोरिटी को नहीं – अहमियत दी जाती है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की बातों को दोहराया कि दसवें शेड्यूल के तहत "पॉलिटिकल पार्टी" और "लेजिस्लेचर पार्टी" के बीच का फ़र्क बुनियादी है। अगर इन दोनों शब्दों को एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल किया गया तो शेड्यूल काम का नहीं रहेगा।

इन दलीलों के बावजूद, कोर्ट ने माना कि पार्टी के प्रस्ताव से जुड़े असल झगड़े, कथित नकली साइन की पेंडिंग क्रिमिनल जांच, स्पीकर के सामने दिखाया गया मेजोरिटी सपोर्ट, और विरोधी नेता को निकालने पर अंतरिम रोक, इन सबने मिलकर पिटीशनर को अंतरिम सुरक्षा के लिए पहली नज़र में मामला बनाने से रोका।

इसके मुताबिक, कोर्ट ने नए मान्यता प्राप्त लीडर ऑफ़ अपोज़िशन और चीफ़ व्हिप के काम करने पर रोक लगाने से मना किया।

रेस्पोंडेंट्स को तीन हफ़्ते के अंदर अपना एफिडेविट फाइल करने का निर्देश दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई, 2026 को होगी।

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