कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने 24 वर्षीय आरोपी को POCSO मामले में सुनाई गई 10 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि नाबालिग की सहमति से बने शारीरिक संबंध को अपराध में राहत या सजा कम करने का आधार नहीं माना जा सकता।
जस्टिस राजर्षि भारद्वाज और जस्टिस रीतोब्रोतो कुमार मित्रा की डिवीजन बेंच आरोपी रूपेश बेक की अपील पर सुनवाई कर रही थी। विशेष POCSO कोर्ट ने अप्रैल 2024 में उसे दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी।
मामले में पीड़िता घटना के समय करीब 17 वर्ष 10 महीने की थी, जबकि आरोपी 24 वर्ष का था। दोनों की मुलाकात 2022 में एक रिश्तेदार की शादी में हुई और बाद में प्रेम संबंध बन गया। पीड़िता आरोपी के साथ रहने लगी और दोनों के बीच दिसंबर 2022 से कई महीनों तक शारीरिक संबंध रहे। बाद में पीड़िता के गर्भवती होने की जानकारी सामने आई, जिसके बाद FIR दर्ज की गई।
आरोपी ने दावा किया कि संबंध सहमति से बने थे, FIR में देरी हुई और पीड़िता के बयानों में विरोधाभास थे। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन के साक्ष्य प्रभावी रूप से चुनौती नहीं दिए गए और आरोपी POCSO की धारा 29 के तहत लागू वैधानिक अनुमान को भी rebut नहीं कर सका।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि "नाबालिग की सहमति को mitigating factor नहीं माना जा सकता", क्योंकि ऐसा करना POCSO कानून के उद्देश्य को कमजोर करेगा।
Romeo-Juliet Clause का भी लाभ नहीं
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी 2026 में चर्चा किए गए "Romeo-Juliet Clause" के सिद्धांत पर भी विचार किया। कोर्ट ने माना कि इसका उद्देश्य समान उम्र के किशोरों के बीच संबंधों को परिस्थितियों के अनुसार POCSO के कठोर प्रावधानों से बचाना है।
हालांकि, बेंच ने कहा कि वर्तमान मामले में इसका लाभ नहीं दिया जा सकता। पीड़िता बाद में किसी अन्य व्यक्ति से शादी कर चुकी थी और उसके एक बच्चे को वर्तमान पति ने स्वीकार किया था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को राहत देने से पीड़िता के वर्तमान पारिवारिक जीवन पर असर पड़ने की संभावना होगी।
डिवीजन बेंच ने अंततः अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और 10 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी।