कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ वकालत का काम करने के लिए बनी पार्टनरशिप फर्म को इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि पार्टनरशिप फर्मों के रजिस्ट्रेशन से जुड़े कानूनी नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं है।

जलपाईगुड़ी में सर्किट बेंच में बैठे जस्टिस बिवास पट्टनायक ने वकील डॉ. अर्जुन चौधरी की रिट याचिका मंज़ूरी की। उन्होंने वेस्ट बंगाल के रजिस्ट्रार ऑफ़ फर्म्स, सोसाइटीज़ एंड नॉन-ट्रेडिंग कॉरपोरेशन्स के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रेड लाइसेंस न होने की वजह से पार्टनरशिप फर्म M/s पिनावा लीगल को रजिस्टर करने से मना कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 की धारा 58 और 59 पार्टनरशिप फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरी तरह से तय करती हैं और रजिस्ट्रेशन से पहले ट्रेड लाइसेंस दिखाने की शर्त नहीं रखतीं।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि एक्ट की धारा 58 के तहत ज़रूरी सभी जानकारी देने के बावजूद, रजिस्ट्रार ने बार-बार एप्लीकेशन पर कार्रवाई करने से मना कर दिया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ट्रेड लाइसेंस जमा नहीं किया गया। यह तर्क दिया गया कि एक बार कानूनी ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद धारा 59 रजिस्ट्रार पर यह ज़रूरी ज़िम्मेदारी डालती है कि वह फर्मों के रजिस्टर में बयान की एंट्री करे और रजिस्ट्रेशन का सर्टिफ़िकेट जारी करे।

याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने ट्रेड लाइसेंस की मांग को सही ठहराने के लिए विभागीय गाइडलाइंस और बंगाल पार्टनरशिप रूल्स, 1933 का हवाला दिया।

इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने पाया कि न तो पार्टनरशिप एक्ट और न ही बंगाल पार्टनरशिप रूल्स वकालत करने वाली पार्टनरशिप फर्म के रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने को ज़रूरी बनाते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि एग्जीक्यूटिव निर्देश या विभागीय गाइडलाइंस मुख्य कानून में बताई गई शर्तों के अलावा कोई और शर्त नहीं लगा सकतीं।

रजिस्ट्रार की ट्रेड लाइसेंस की मांग को कानूनी रूप से गलत मानते हुए कोर्ट ने अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वह ट्रेड लाइसेंस दिखाने की ज़िद किए बिना दो हफ़्ते के अंदर याचिकाकर्ता की एप्लीकेशन (नंबर APP-022334) पर कार्रवाई करे और उसे रजिस्टर करे।

Case Title: Dr. Arjun Chowdhury v. State of West Bengal & Ors.

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