आरोपी को सार्वजनिक रूप से घुमाना स्वीकार्य नहीं, यह मानवाधिकारों का उल्लंघन: कलकत्ता हाईकोर्ट की मौखिक टिप्पणी
कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से कहा कि किसी आरोपी को पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से घुमाना "स्वीकार्य नहीं है" और यह "मानवाधिकारों का उल्लंघन" है।
अदालत यह टिप्पणी तृणमूल कांग्रेस नेता सौकत मोल्ला की याचिका पर सुनवाई के दौरान कर रही थी, जिसमें उन्होंने जांच के दौरान कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से घुमाए जाने को चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान सौकत मोल्ला की ओर से सीनियर एडवोकेट किशोर दत्ता ने कहा कि गिरफ्तारी के बाद आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने की एक चिंताजनक परंपरा विकसित हो गई।
उन्होंने अदालत से कहा,
"आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने की एक संस्कृति विकसित हो गई। किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है।"
इस पर अदालत ने कहा,
"हां, यह स्वीकार्य नहीं है। यह मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है।"
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि याचिका का मुख्य आधार उनके मुवक्किल को कथित रूप से सार्वजनिक रूप से घुमाया जाना है। उन्होंने बताया कि कार्यवाही रद्द करने की मांग के साथ-साथ पुलिस की इस कार्रवाई को भी चुनौती दी गई।
हालांकि, पीठ ने कार्यवाही रद्द करने की मांग पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब याचिकाकर्ता पहले से ही न्यायिक हिरासत में है, तो ऐसी स्थिति में इस राहत का क्या औचित्य है।
अदालत ने पूछा,
"यदि वह पहले से हिरासत में है, तो अब क्या शेष रह जाता है? क्या उसे सार्वजनिक रूप से घुमाया गया था?"
इस पर सीनियर एडवोकेट ने कहा कि उनके मुवक्किल को वास्तव में सार्वजनिक रूप से घुमाया गया था।
राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जरनल ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी को केवल घटनास्थल की पहचान और घटनाक्रम के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से वहां ले जाया गया था।
उन्होंने अदालत को बताया कि घटनास्थल पर लोगों की भीड़ एकत्र हो गई थी, लेकिन किसी भी अप्रिय घटना को नहीं होने दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आरोपित है और उसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी भी कर रही है।
इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि यदि राज्य का यह कहना है कि यह कार्रवाई राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने की थी, तो उसे भी मामले में पक्षकार बनाया जाएगा।
एडिशनल एडवोकेट जरनल ने जवाब दिया कि शुरुआत में आरोपी की हिरासत राष्ट्रीय जांच एजेंसी के पास थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि उसके समक्ष रखी गई रिपोर्ट में संबंधित दंडात्मक धाराओं का उल्लेख नहीं किया गया।
इस पर अदालत ने टिप्पणी की,
"रिपोर्ट में धाराएं बताई ही नहीं गई हैं।"
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि FIR में नामजद मुख्य आरोपी की अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई और अदालत से प्राथमिकी की सामग्री पर भी विचार करने का अनुरोध किया गया।
हालांकि पीठ ने मामले के तथ्यों को गंभीर बताते हुए कार्यवाही रद्द करने की मांग पर संदेह जताया और कहा,
"मामले के तथ्य बेहद गंभीर हैं। फिर कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना क्यों?"
मामले की सुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी गई।