कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार 'आदर्श नियोक्ता' होने के नाते सार्वजनिक रोजगार में समानता के मूल सिद्धांत का उल्लंघन नहीं कर सकती। समान परिस्थितियों में नियुक्त कर्मचारियों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना जरूरी है।

अदालत ने इसी आधार पर 25 अस्थायी डॉक्टरों में से एक डॉक्टर को उसकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमित करने के आदेश को बरकरार रखा और केंद्र सरकार की याचिका खारिज की।

जस्टिस पार्थ सारथी चटर्जी और कार्यवाहक चीफ जस्टिस तपाब्रत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने कहा कि जब कर्मचारियों की स्थिति और परिस्थितियां समान हों, तो किसी एक व्यक्ति को मिले न्यायिक आदेश का लाभ केवल यह कहकर दूसरे समान कर्मचारियों से रोका नहीं जा सकता कि वह आदेश केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित था।

मामला 1994 से 1997 के बीच स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन विभिन्न कार्यालयों में अस्थायी आधार पर नियुक्त किए गए डॉक्टरों से जुड़ा था। मंत्रालय ने इन डॉक्टरों की सेवाओं को नियमित करने के लिए संघ लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भेजा था।

संघ लोक सेवा आयोग ने संबंधित चिकित्सकों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट, जीवन-वृत्त और उनके कार्य प्रदर्शन के आधार पर उनकी उपयुक्तता का आकलन किया। सभी 25 डॉक्टरों को मेडिकल ऑफिसर के पद पर नियमित नियुक्ति के लिए योग्य पाया गया।

इसके बाद 4 फरवरी 2016 के एक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से केंद्र सरकार ने सूचित किया कि राष्ट्रपति ने संघ लोक सेवा आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दी। इसके आधार पर 25 अस्थायी डॉक्टरों को 18 सितंबर 2014 से मेडिकल ऑफिसर के पद पर नियुक्त किया गया।

इन डॉक्टरों में शामिल एक डॉक्टर ने अपनी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से सेवा नियमित करने की मांग करते हुए न्यायाधिकरण का रुख किया। न्यायाधिकरण ने उसकी मांग स्वीकार कर ली। केंद्र सरकार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन याचिका खारिज हो गई। इसके बाद केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।

इसके बाद डॉक्टर ने दोबारा न्यायाधिकरण में आवेदन कर प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण और उससे जुड़े सभी लाभ देने की मांग की। न्यायाधिकरण ने अधिकारियों को तीन महीने के भीतर उसकी नियुक्ति को प्रारंभिक तारीख से नियमित करने और सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।

केंद्र सरकार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि पहले के न्यायिक आदेश केवल संबंधित व्यक्ति के मामले तक सीमित थे और उन्हें दूसरे मामलों में मिसाल के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता।

सरकार ने यह भी कहा कि डॉक्टर की प्रारंभिक नियुक्ति अस्थायी थी और भर्ती नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नहीं हुई थी, इसलिए सेवा को प्रारंभिक तारीख से नियमित करना उचित नहीं था।

केंद्र की ओर से यह भी दलील दी गई कि नियमितीकरण सामान्य तौर पर भविष्य की तारीख से होना चाहिए। प्रारंभिक तारीख से नियमितीकरण करने पर वरिष्ठता प्रभावित होने की आशंका हो सकती है।

दूसरी ओर, डॉक्टर की ओर से कहा गया कि 23 अगस्त 2020 के मंत्रालय के ज्ञापन में 25 डॉक्टरों की वरिष्ठता को संबंधित मामले के परिणाम के अधीन रखा गया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर गौर करते हुए कहा कि 4 फरवरी 2016 के ज्ञापन के अनुसार सभी 25 डॉक्टरों की योग्यता का एक समान आधार पर आकलन किया गया। उनकी संबंधित रिपोर्ट, जीवन-वृत्त और व्यक्तिगत बातचीत के दौरान प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए सभी को मेडिकल ऑफिसर के पद पर नियुक्ति के लिए योग्य पाया गया।

खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार ऐसा कोई तथ्य या दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि संबंधित डॉक्टर की स्थिति उन 24 अन्य डॉक्टरों से अलग थी, जिन्हें उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमित किया गया।

अदालत ने कहा कि सभी 25 डॉक्टरों के मामले आपस में सीधे जुड़े हुए थे और संघ लोक सेवा आयोग ने भी सभी के लिए एक साथ सिफारिश की थी। ऐसे में केंद्र सरकार का यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पहले के आदेश केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित थे।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार एक आदर्श नियोक्ता होने के नाते कानून के तहत समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान व्यवहार के मूल सिद्धांत का उल्लंघन नहीं कर सकती।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण का आदेश बरकरार रखा और केंद्र सरकार की याचिका खारिज की। इससे संबंधित डॉक्टर को उसकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण और उससे जुड़े लाभ देने का आदेश कायम रहा।

अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: