पश्चिम बंगाल सरकार करेगी 1.69 करोड़ जाति प्रमाण पत्रों की जांच: CPIM(L) ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

Update: 2026-06-23 04:22 GMT

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन ने कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की। इसमें पश्चिम बंगाल सरकार के उस मेमोरेंडम को चुनौती दी गई, जिसमें 2011 से राज्य में जारी सभी अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के जाति प्रमाण पत्रों का बड़े पैमाने पर दोबारा वेरिफिकेशन करने का निर्देश दिया गया।

याचिका में पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग द्वारा 14 मई, 2026 को जारी मेमोरेंडम पर सवाल उठाए गए। इसमें कहा गया कि इससे लगभग 1.69 करोड़ जाति प्रमाण पत्र प्रभावित होते हैं और यह चल रही 'विशेष गहन समीक्षा' (SIR) प्रक्रिया के दौरान जाति वेरिफिकेशन को वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया से गैर-कानूनी रूप से जोड़ने की कोशिश करता है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस मेमोरेंडम को कोई कानूनी आधार नहीं है और यह 'पश्चिम बंगाल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (पहचान) अधिनियम, 1994' के प्रावधानों के खिलाफ है। उनका तर्क है कि राज्य उन जाति प्रमाण पत्रों को बिना किसी ठोस कारण के दोबारा नहीं खोल सकता, जो धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या किसी व्यक्तिगत जांच के आरोपों के बिना सही तरीके से जारी किए गए।

याचिका में यह भी कहा गया कि मेमोरेंडम जाति की स्थिति को वोटर लिस्ट की स्थिति से जोड़कर दो अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं को गैर-कानूनी रूप से एक साथ मिलाता है। याचिका में कहा गया कि जहां जाति प्रमाण पत्र 1994 के अधिनियम के तहत कानूनी ढांचे से नियंत्रित होते हैं, वहीं वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने या हटाने की प्रक्रिया चुनाव कानूनों से नियंत्रित होती है। इसे जाति वेरिफिकेशन पर निर्भर नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई मनमानी है, संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4), 16(4) और 21 का उल्लंघन करती है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त, जनजातीय विकास (1994)' मामले में तय किए गए सिद्धांतों के खिलाफ है, जो जाति प्रमाण पत्रों के वेरिफिकेशन और उन्हें रद्द करने की प्रक्रिया तय करते हैं।

इसमें यह भी बताया गया कि राज्य भर में दोबारा वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने 4 जून, 2026 को अधिकारियों को मेमोरेंडम वापस लेने के लिए आवेदन दिया, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसलिए याचिका में 14 मई के मेमोरैंडम को रद्द करने और मामले के निपटारे तक री-वेरिफिकेशन की प्रक्रिया के तहत किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा की मांग की गई।

Case: Communist Party of India, (Marxist Leninist), Liberation West Bengal State Committee & Anr. Versus The State of West Bengal & Anr.

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