कोलकाता हाईकोर्ट ने बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में करीब दो महीने से हिरासत में रखे गए एक व्यक्ति के मामले में राज्य सरकार से सवाल किया कि आखिर बिना तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किए किसी व्यक्ति को इतने लंबे समय तक हिरासत में कैसे रखा जा सकता है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि अगर 1970 के दशक में बड़ी संख्या में लोगों ने सीमा पार की थी तो क्या उन सभी को वापस भेजना संभव है?

जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की बेंच के सामने मामले की सुनवाई हुई। राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल राजदीप मजूमदार पेश हुए।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा,

“1970 के दशक में कितने लोगों ने सीमा पार की थी? क्या उन सभी को वापस भेजना संभव है? सीमावर्ती जिलों में जाकर देखिए... क्या यह संभव है? जब तक आप तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं करते, किसी व्यक्ति को हिरासत में कैसे रखा जा सकता है?”

कोर्ट ने व्यक्ति की हिरासत की अवधि पर भी विशेष सवाल उठाया और पूछा,

“8 अगस्त से?”

अदालत इस बात की जांच कर रही थी कि संबंधित व्यक्ति करीब दो महीने से हिरासत में क्यों है और उसकी हिरासत जारी रखने का आधार क्या है।

मामले में कोर्ट ने उस सामग्री पर भी सवाल उठाया, जिसके आधार पर व्यक्ति के खिलाफ निर्वासन का आदेश पारित किया गया। कोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया यह आदेश परिवार के कुछ सदस्यों के बयानों के आधार पर पारित किया गया प्रतीत होता है।

इस पर कोर्ट ने पूछा,

“क्या परिवार के किसी सदस्य का बयान यह साबित करता है कि वह बांग्लादेशी है?”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को देश से बाहर भेजने से पहले उसकी राष्ट्रीयता तय करने वाली प्रासंगिक सामग्री पर विचार करना जरूरी होगा। केवल आरोप या किसी परिजन के बयान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यक्ति विदेशी नागरिक है।

राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल ने दलील दी कि यदि पैन या आधार जैसे दस्तावेज फर्जी कागजात के आधार पर हासिल किए गए हों तो यह अपने आप में निर्वासन का आधार हो सकता है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को यह भी बताया गया कि फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (FRRO) ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ निर्वासन का आदेश उस समय पारित किया, जब हाईकोर्ट पहले ही इस मामले में आदेश दे चुका था और कार्यवाही लंबित थी। कोर्ट ने भी इस तथ्य को दर्ज किया कि मामले के लंबित रहने के दौरान बाद में निर्वासन आदेश पारित किया गया।

जब राज्य की ओर से कोर्ट से आग्रह किया गया कि याचिकाकर्ता को FRRO के समक्ष जाने का निर्देश दिया जाए तो हाईकोर्ट ने इससे इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि संबंधित व्यक्ति को पुलिस ने हिरासत में लिया था और हिरासत का मेमो भी पुलिस अधिकारियों ने जारी किया। ऐसे में मामले की जिम्मेदारी से बचते हुए याचिकाकर्ता को केवल FRRO के पास जाने के लिए नहीं कहा जा सकता।

इसके बाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका को उपयुक्त बेंच के समक्ष रखने के लिए रिलीज कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामले को उन मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच के सामने रखा जाए, जिनका संबंध स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से है।

अब मामले को 14 अक्टूबर को जस्टिस कृष्ण राव की बेंच के सामने पेश किया जाएगा।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: