रिश्वत मांगने के आरोप में फंसे आबकारी अधिकारी को राहत नहीं, कलकत्ता हाइकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने से किया इनकार
कथित तौर पर लाइसेंस देने के बदले रिश्वत मांगने के मामले में फंसे एक आबकारी अधिकारी को कलकत्ता हाइकोर्ट से राहत नहीं मिली।
अदालत ने भ्रष्टाचार से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग खारिज करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जिनकी जांच ट्रायल के दौरान ही की जाएगी।
जस्टिस अपूर्व सिन्हा राय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है, न कि पूरे मामले का परीक्षण करना।
मामला पश्चिम बंगाल सिविल सेवा के एक उप-आबकारी आयुक्त से जुड़ा है, जिन्हें 2016 में एंटी करप्शन शाखा ने ट्रैप केस में गिरफ्तार किया था। आरोप है कि उन्होंने आबकारी लाइसेंस दिलाने के बदले अवैध रिश्वत की मांग की थी।
अदालत ने कहा कि अभियोजन का मामला ट्रैप से जुड़े सबूतों पर आधारित है, जिनमें ट्रैप से पहले और बाद की कार्यवाही का विवरण, दागी नोटों की बरामदगी और आरोपी के हाथों पर रासायनिक परीक्षण में फिनॉल्फ्थेलीन पाए जाने की पुष्टि शामिल है। साथ ही गवाहों के बयान भी रिश्वत मांगने और पैसे लेने की ओर इशारा करते हैं।
अदालत ने दोहराया कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत अपराध साबित करने के लिए रिश्वत की मांग एक जरूरी तत्व है। हालांकि इस चरण पर विस्तृत जांच करना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता की इस दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि मामले में प्रारंभिक जांच नहीं की गई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रैप मामलों में गोपनीयता और त्वरित कार्रवाई के कारण प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं होती।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कुछ प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं हुआ लेकिन केवल इसी आधार पर जब पर्याप्त आरोपित सामग्री मौजूद हो कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।
क्षेत्राधिकार को लेकर उठाए गए सवालों पर भी अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले सख्त भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं होते और सरकारी अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर भी प्रभाव का दावा कर सकते हैं।
विभागीय कार्यवाही के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही रद्द किए जाने का मतलब यह नहीं है कि आपराधिक मामला भी खत्म हो जाए क्योंकि विभागीय मामला साक्ष्यों के पूर्ण परीक्षण के बाद समाप्त नहीं हुआ था।
अदालत ने अंत में कहा कि अभियोजन के पास ऐसे पर्याप्त आधार हैं जो यह संकेत देते हैं कि रिश्वत की मांग और स्वीकार किया जाना हुआ था। इसलिए मामले की सच्चाई का परीक्षण ट्रायल में ही किया जाना चाहिए।
इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।