CBI ने जब दोषमुक्त कर दिया हो तो ED कार्रवाई नहीं चला सकती: कलकत्ता हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामला रद्द किया

Update: 2026-05-27 06:40 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में लुई ड्रेफस कंपनी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ चल रही मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही रद्द की। अदालत ने कहा कि जब मूल अपराध की जांच कर रही CBI किसी कंपनी की संलिप्तता नहीं पाती, तब प्रवर्तन निदेशालय (ED) उसी आधार पर धनशोधन का मुकदमा नहीं चला सकता।

जस्टिस सुव्रा घोष ने कहा कि ED ने कंपनी के खिलाफ कोई स्वतंत्र साक्ष्य पेश नहीं किया और मुख्य रूप से सह-आरोपी के बयान पर ही भरोसा किया।

अदालत ने स्पष्ट कहा,

“याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं है, जिससे उस पर मुकदमा चलाया जा सके।”

मामले की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी जब CBI ने प्रकाश वाणिज्य प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक मनोज कुमार जैन और अन्य के खिलाफ केंद्रीय बैंक को लगभग 234.57 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने के आरोप में FIR दर्ज की थी। बाद में CBI ने भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत आरोपपत्र दाखिल किया। इसी आधार पर ED ने वर्ष 2016 में धनशोधन का मामला दर्ज किया।

ED का आरोप था कि लुई ड्रेफस कंपनी ने 25 करोड़ रुपये के लेटर ऑफ क्रेडिट से जुड़े गोलमोल लेनदेन में भाग लिया और धन को दूसरी कंपनियों के जरिए वापस भेजने में मदद की। एजेंसी ने इन लेनदेन को केवल कागजी लेनदेन बताया।

कंपनी की ओर से सीनियर एडवोकेट संदीपन गांगुली ने अदालत को बताया कि ये सभी लेनदेन वैध व्यापारिक प्रक्रिया के तहत गोदाम रसीदों के माध्यम से किए गए और इसमें माल का वास्तविक परिवहन आवश्यक नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि CBI ने विस्तृत जांच के बाद कंपनी को आरोपी नहीं बनाया बल्कि उसके अधिकृत प्रतिनिधि को अभियोजन पक्ष का गवाह बनाया था।

अदालत ने माना कि केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर धनशोधन का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। फैसले में कहा गया कि सह-आरोपी का बयान केवल अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों को समर्थन दे सकता है वह अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि जिस क्वालिटी विनट्रेड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के जरिए लेनदेन होने का आरोप लगाया गया, उसे न तो मूल अपराध में आरोपी बनाया गया और न ही मनी लॉन्ड्रिंग मामले में। ऐसे में इन लेनदेन को प्रथम दृष्टया अवैध नहीं माना जा सकता।

जस्टिस घोष ने कहा कि एक स्थिति वह हो सकती है, जहां कोई व्यक्ति मूल अपराध में आरोपी न हो लेकिन बाद में धनशोधन में उसकी भूमिका सामने आए। लेकिन यहां मामला अलग है, क्योंकि CBI ने विस्तृत जांच के बाद कंपनी को दोषमुक्त कर दिया था।

अदालत ने कहा,

“जब CBI ने याचिकाकर्ता को अनुसूचित अपराध से जुड़ी किसी भी आपराधिक गतिविधि से मुक्त पाया है, तब उसे अपराध से अर्जित धन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल नहीं माना जा सकता।”

हाईकोर्ट ने माना कि कंपनी के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर अदालत ने वर्ष 2018 के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को कंपनी के संबंध में रद्द किया। हालांकि अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई।

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