दल से निष्कासित विधायक को विपक्ष का नेता कैसे मान्यता दी गई? कलकत्ता हाईकोर्ट ने विधानसभा स्पीकर से जुड़े फैसले पर उठाए सवाल
कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता की नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या विधानसभा अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल की सहमति के बिना उसके कथित बागी विधायक को विपक्ष का नेता मान्यता दे सकते हैं, विशेषकर तब जब उसे पार्टी से निष्कासित किया जा चुका हो।
जस्टिस कृष्ण राव की अदालत विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत बनर्जी को दी गई मान्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका में दावा किया गया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले दल ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता पद के लिए नामित किया, लेकिन इसके बावजूद विधानसभा स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता और मुख्य सचेतक के रूप में मान्यता दी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य पक्ष से पूछा,
"क्या विधानसभा स्पीकर राजनीतिक दल की सहमति के बिना किसी बागी नेता को विपक्ष का नेता मान्यता दे सकते हैं? जिसे विपक्ष का नेता बनाया गया, वह अब किसी राजनीतिक दल में नहीं है। उसे पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है।"
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट कल्याण बंद्योपाध्याय ने अदालत से अंतरिम रोक लगाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि 6 मई को निर्वाचित विधायकों की बैठक में शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता पद के लिए दल का आधिकारिक उम्मीदवार चुना गया और उनके समर्थन में विधायकों के हस्ताक्षर भी जुटाए गए।
उन्होंने दलील दी कि इस निर्णय की जानकारी कई बार विधानसभा स्पीकर को दी गई, लेकिन इसके बावजूद 59 विधायकों के समर्थन का दावा करने वाले एक अलग गुट को मान्यता दी गई।
बंद्योपाध्याय ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले स्पष्ट करते हैं कि प्राथमिकता राजनीतिक दल की इच्छा को दी जानी चाहिए, केवल विधायक दल की संख्या को नहीं।
उन्होंने अदालत में कहा,
"विधानसभा अध्यक्ष को राजनीतिक दल के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए, न कि केवल विधायक दल के निर्णय को।"
उनका तर्क था कि यदि राजनीतिक दल और विधायक दल को एक समान मान लिया जाए, तो दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों को विपक्ष का नेता और मुख्य सचेतक के रूप में मान्यता दी गई, उन्हें पहले ही पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है और निष्कासन के आदेश को कहीं चुनौती भी नहीं दी गई।
राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जरनल बिल्वदल भट्टाचार्य ने अंतरिम राहत का विरोध करते हुए कहा कि याचिका में आवश्यक तथ्यों और प्रार्थनाओं का अभाव है। उन्होंने अदालत से समय मांगा ताकि विधानसभा के रिकॉर्ड और संबंधित आदेश प्रस्तुत किए जा सकें।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार यह जानना चाहा कि विपक्ष के नेता की मान्यता से संबंधित कोई औपचारिक आदेश जारी हुआ है या नहीं।
अदालत ने कहा कि यदि ऐसा आदेश पारित किया गया तो उसकी प्रति न्यायिक जांच के लिए उपलब्ध होनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले सत्र का हवाला देते हुए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की और आशंका जताई कि इस बीच सदन में बैठने की व्यवस्था जैसी अन्य प्रक्रियाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया। अदालत ने कहा कि पहले विधानसभा स्पीकर का आदेश रिकॉर्ड पर लाया जाए, उसके बाद मामले पर विचार किया जाएगा।
सुनवाई समाप्त करते हुए अदालत ने कहा,
"मामले को फिर सूचीबद्ध करें, पहले अध्यक्ष का आदेश सामने आने दीजिए।"
मामले की अगली सुनवाई 16 जून को निर्धारित की गई।