कलकत्ता हाईकोर्ट ने फेसबुक के ज़रिए अनुसूचित जाति (SC) के शिकायतकर्ता के साथ कथित तौर पर जातिसूचक दुर्व्यवहार के मामले में दायर "Nil/No clue" (कोई सुराग नहीं) वाली फाइनल रिपोर्ट को खारिज किया और विशेष साइबर-फोरेंसिक चैनलों के माध्यम से आगे की जांच का निर्देश दिया।

जस्टिस उदय कुमार CRR 2992/2023 मामले की सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा अन्य आपराधिक मामले दर्ज कराने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि जाति-आधारित दुर्व्यवहार की किसी अलग शिकायत में कोई दम नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(1)(r)/(s) के तहत, "पब्लिक व्यू" (सार्वजनिक रूप से देखा जाना) की शर्त केवल भौतिक स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल क्षेत्र तक भी फैल सकती है।

कोर्ट अलीपुर की विशेष अदालत के 27 जून, 2023 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस आदेश में अदालत ने शिकायतकर्ता की विरोध याचिका (Protest Petition) खारिज की, पुलिस की 'फाइनल रिपोर्ट ट्रू' (FRT) स्वीकार की और विशेष कार्यवाही बंद की।

याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उसने आरोप लगाया कि रबीउल इस्लाम बुलबुल और सायन दत्ता ने फेसबुक पर उनकी जातिगत पहचान, धर्म, ईश्वर और परिवार के खिलाफ भद्दी, अमर्यादित और जातिसूचक टिप्पणियां पोस्ट की थीं। उन्होंने अपनी शिकायत के साथ कथित पोस्ट के स्क्रीनशॉट भी संलग्न किए।

इस शिकायत के परिणामस्वरूप बेहला पुलिस स्टेशन में SC/ST Act की धारा 3(1)(r)/(s) के तहत केस नंबर 274/2022 दर्ज किया गया, जिसे बाद में विशेष केस नंबर 89/2022 के रूप में दर्ज किया गया।

जांच के दौरान, पुलिस ने CrPC की धारा 164 के तहत शिकायतकर्ता का बयान और CrPC की धारा 161 के तहत स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज किए तथा डिजिटल लिंक और स्क्रीनशॉट से संबंधित ज़ब्ती सूची (seizure list) तैयार की। हालांकि, जांच एजेंसी ने 20 जनवरी, 2023 को एक "Nil/No clue" (कोई सुराग नहीं) वाली FRT रिपोर्ट सौंपी। इसमें कहा गया कि कोलकाता के साइबर पुलिस स्टेशन के ज़रिए फ़ेसबुक से यूज़र की जानकारी हासिल करने की कोशिशों से ज़रूरी जानकारी नहीं मिल पाई।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने एक विरोध याचिका (Protest Petition) दायर की, जिसे स्पेशल कोर्ट ने खारिज किया। स्पेशल कोर्ट ने जिन वजहों का हवाला दिया, उनमें से एक यह थी कि उसी शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराए गए तीन अन्य स्पेशल मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई, जबकि इस मामले में "Nil" चार्जशीट/FRT दाखिल की गई।

हाईकोर्ट को यह तर्क सही नहीं लगा।

कोर्ट ने कहा,

"इस मामले में जो बात न्यायिक विवेक को हैरान करती है, वह स्पेशल जज का यह तर्क है कि चूंकि शिकायतकर्ता ने तीन अन्य स्पेशल मामले दर्ज कराए, जिनमें चार्जशीट दाखिल की गई, इसलिए इस मामले में 'Nil' रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।"

कोर्ट ने आगे कहा कि आपराधिक मामलों की सुनवाई में हर अलग आपराधिक घटना और मामले की जांच उसके अपने तथ्यों और सबूतों के आधार पर की जानी चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"किसी व्यक्ति द्वारा पहले या साथ-साथ चल रहे अलग-अलग मामलों में कानूनी रास्ता अपनाने के आधार पर, डिजिटल मीडिया के ज़रिए जातिसूचक अपमान की किसी अलग और बाद की शिकायत खारिज नहीं की जा सकती और न ही उसमें दम न होने का अनुमान लगाया जा सकता है।"

इसके अनुसार रिविज़न याचिका स्वीकार कर ली गई।

Case: SRI SAYAN MONDAL -VS- THE STATE OF WEST BENGAL

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: