'लव जिहाद' का आरोप रिकॉर्ड से साबित नहीं, लेकिन आरोपी पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से कलकत्ता हाईकोर्ट का इनकार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि एक महिला को इस्लाम में धर्मांतरित करने के किसी प्रयास का रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से खुलासा नहीं होता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले को 'लव जिहाद' के रूप में पेश करने का आरोप उपलब्ध सामग्री से समर्थित नहीं है और इस शब्द को किसी कानून के तहत परिभाषित नहीं किया गया है।
जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने पुलिस कांस्टेबल और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत पहचान बताने, मारपीट, गलत तरीके से बंधक बनाने और सहमति के बिना यौन संबंध बनाने के आरोपों से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।
15 अक्टूबर को पारित आदेश में कोर्ट ने कहा कि शिकायत, केस डायरी और चार्जशीट में मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराधों का खुलासा करती है। आरोपियों के बचाव का परीक्षण साक्ष्यों और गवाहों की जिरह के बाद ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।
'लव जिहाद' को लेकर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि संसद द्वारा पारित ऐसा कोई केंद्रीय कानून नहीं है, जो 'लव जिहाद' को परिभाषित करता हो या उसे अपराध घोषित करता हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में इस विषय पर विशेष रूप से लागू कोई कानून या प्रभावी धर्मांतरण-विरोधी कानून नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि मौजूदा स्तर पर मामले को 'लव जिहाद' कहना रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से समर्थित नहीं है और इसका अदालत के आकलन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
महिला ने पहचान और शादीशुदा होने की बात छिपाने का आरोप लगाया
मामले में महिला ने आरोप लगाया कि 2016 के अंत में मुख्य आरोपी से उसकी मुलाकात हुई थी। महिला के अनुसार, आरोपी ने अपना नाम 'राजीब सरकार' बताया, खुद को हिंदू अविवाहित व्यक्ति और पुलिस कांस्टेबल के रूप में पेश किया तथा उससे शादी करने का वादा किया।
शिकायत के मुताबिक, आरोपी ने मई 2021 में दीघा के एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से उससे शादी की और बाद में दोनों बर्धमान में किराए के मकान में रहने लगे। महिला का आरोप है कि बाद में एक फोन कॉल के जरिए उसे आरोपी के वास्तविक नाम, धर्म और पहले से विवाहित होने की जानकारी मिली।
महिला ने आगे आरोप लगाया कि इसके बाद आरोपी ने उसके साथ मारपीट की, उसे बंधक बनाया और उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाए। उसने आरोपी के परिवार के सदस्यों पर भी मुर्शिदाबाद स्थित घर में मारपीट करने और साड़ी से गला घोंटने का प्रयास करने का आरोप लगाया। महिला ने दावा किया कि इसके बाद उसका गर्भपात हो गया। हालांकि, राज्य ने बताया कि जांच के दौरान गर्भावस्था की पुष्टि निर्णायक रूप से नहीं हुई और IPC की धारा 313 के तहत आरोप हटा दिया गया था।
आरोपियों ने इन आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि संबंध सहमति से था और महिला ने भी अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाई थी। उन्होंने झूठे मामले में फंसाने और पैसे वसूलने की धमकी देने का आरोप भी लगाया।
सहमति और धोखाधड़ी के सवाल ट्रायल में तय होंगे
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की सहमति तथ्य की गलत धारणा के कारण प्राप्त की गई थी या नहीं, और क्या उसे आरोपी की वास्तविक पहचान तथा वैवाहिक स्थिति की जानकारी थी, इन सवालों का फैसला साक्ष्यों के बिना नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि आरोप केवल शादी का वादा पूरा न करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आरोपी की पहचान और वैवाहिक स्थिति छिपाने से भी जुड़े हैं। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाले बिना कि महिला की सहमति स्वतंत्र और पूरी जानकारी के आधार पर थी, आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कथित विवाह कानूनी रूप से अमान्य पाया जाता है, तो IPC की धारा 498A लागू होने का प्रश्न अलग से विचारणीय हो सकता है। लेकिन इससे मारपीट, गलत तरीके से बंधक बनाने, धमकी और सहमति के बिना यौन संबंध जैसे अन्य आरोप स्वतः समाप्त नहीं हो जाते।
विभागीय जांच का निष्कर्ष आपराधिक मुकदमे को खत्म करने का आधार नहीं
आरोपियों ने मुख्य आरोपी के खिलाफ विभागीय जांच का हवाला भी दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे के उद्देश्य, मंच तथा साक्ष्य के मानक अलग-अलग होते हैं। इसलिए विभागीय जांच में आरोप साबित न होना अपने आप में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. v. State of Maharashtra फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। शुरुआती चरण में अदालत को आरोपों की विश्वसनीयता का विस्तृत परीक्षण नहीं करना चाहिए।
अंततः हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और संबंधित आवेदनों का निपटारा कर दिया।