अगर इतने प्रभावशाली हैं तो अमतला में उनका कार्यालय कैसे ढहाया जा रहा है? अभिषेक बनर्जी को अंतरिम राहत के विरोध पर कलकत्ता हाईकोर्ट का सवाल
कलकत्ता हाईकोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस नेता और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज FIR के मामले में उनकी राजनीतिक पहुंच और जांच प्रभावित करने की आशंका को लेकर किए गए दावे पर सवाल उठाया।
अदालत ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह तर्क किस हद तक कायम रह सकता है, इस पर विचार करना होगा।
जस्टिस सौगत भट्टाचार्य अभिषेक बनर्जी की ओर से दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें उनके खिलाफ दर्ज तीन FIR रद्द करने की मांग की गई।
अदालत ने उनकी गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा बढ़ा दी और मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया।
सुनवाई के दौरान बनर्जी की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनके खिलाफ दर्ज FIR की संख्या अब बढ़कर 16 हो गई है।
उन्होंने यह भी बताया कि इंटरनेट पर केवल FIR के पहले पन्ने उपलब्ध हैं और पूरी प्राथमिकी तथा शिकायतों की प्रतियां उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।
एक शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने अंतरिम सुरक्षा का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अभिषेक बनर्जी अब भी एक प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति हैं। यदि उन्हें गिरफ्तारी से सुरक्षा दी गई तो इससे जांच और गवाहों पर असर पड़ सकता है।
इस पर अदालत ने राज्य में राजनीतिक परिस्थितियों में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि क्या पहले जैसा प्रभाव होने का दावा अब भी किया जा सकता है।
अदालत ने अमतला में अभिषेक बनर्जी के सांसद कार्यालय के रूप में इस्तेमाल हो रही संपत्ति से जुड़े ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा,
“अगर वह इतने प्रभावशाली हैं तो अमतला में उनका कार्यालय कैसे ढहाया जा रहा है? जहां इस अदालत की एक अन्य पीठ को ध्वस्तीकरण रोकने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा? यह आपके इस तर्क का समर्थन नहीं करता कि याचिकाकर्ता बहुत प्रभावशाली हैं। क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का कार्यालय उसके ही निर्वाचन क्षेत्र में इस तरह ढहाया जा रहा है?”
राज्य के महाधिवक्ता सुरोजित नाथ मित्र ने जवाब देते हुए कहा कि जिस संपत्ति के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई, वह अभिषेक बनर्जी की नहीं है। उन्होंने यह दावा भी खारिज किया कि संपत्ति का संबंध लीप्स एंड बाउंड्स नामक कंपनी से है, जिसे अभिषेक बनर्जी से जोड़ा जाता रहा है।
अदालत ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के समय पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई सप्ताहांत से ठीक पहले शुरू होने पर अक्सर न्यायपालिका पर तत्काल सुनवाई का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
जस्टिस भट्टाचार्य ने कहा,
“क्या मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से पहले यह किया जा सकता था? मैं सभी से पूछ रहा हूं। इससे पता चलता है कि स्थिति बदल गई है। और यह ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुक्रवार शाम को शुरू हुई। कल के मामले की तरह, रैली का मामला भी। सभी कार्यवाही शुक्रवार शाम से शुरू की जा रही हैं और फिर अदालत को सप्ताहांत में बैठना पड़ता है।”
हालांकि, शिकायतकर्ता के वकील ने अपना पक्ष दोहराते हुए कहा कि अभिषेक बनर्जी अब भी बेहद प्रभावशाली हैं और उन्हें अंतरिम सुरक्षा दिए जाने से जांच प्रभावित हो सकती है।
वकील ने कहा,
“4 मई के बाद भी वह प्रभावशाली हैं। कृपया उन्हें अंतरिम सुरक्षा न दें। जांच प्रभावित होगी और कोई आम व्यक्ति उनके खिलाफ गवाही देने के लिए आगे नहीं आएगा। यदि यह अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति बाहर रहता है तो शिकायतकर्ता को शिकायत वापस लेने के लिए मजबूर किया जाएगा।”
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने भी अंतरिम राहत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि FIR में संज्ञेय अपराध सामने आते हैं और ऐसी स्थिति में FIR रद्द करने की याचिका में शुरुआत में ही गिरफ्तारी से सुरक्षा नहीं दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा,
“यदि FIR से संज्ञेय अपराध सामने आता है तो उसे शुरुआती स्तर पर रद्द नहीं किया जा सकता। अंतरिम आदेश के लिए पहली आवश्यकता प्रथम दृष्टया मामला है। उन्हें प्रथम दृष्टया मामला दिखाना होगा। वह अग्रिम जमानत के लिए जा सकते थे और दंडात्मक कार्रवाई न करने की मांग कर सकते थे। लेकिन वह प्राथमिकी रद्द करने आए हैं। यदि प्राथमिकी रद्द करने का मामला नहीं बनता तो अंतरिम राहत का मामला कैसे बनता है?”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्राथमिकी में संज्ञेय अपराध बनता है तो केवल जांच में देरी FIR रद्द करने का आधार नहीं हो सकती।
एडिशनल एडवोकेट जरनल बिल्वदल भट्टाचार्य ने भी अंतरिम सुरक्षा का विरोध करते हुए अभिषेक बनर्जी के जांच में सहयोग से जुड़े पुराने घटनाक्रम का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अदालत के आदेशों के बावजूद राज्य को आवाज का नमूना लेने के लिए अभिषेक बनर्जी को जांच में सहयोग करने का निर्देश देने के लिए अलग आवेदन करना पड़ा था।
उन्होंने कहा,
“मैं अधिक व्यावहारिक पहलू पर हूं। एक सप्ताह बाद वह वापस आकर कहेंगे कि मैं सहयोग कर रहा हूं और अब वे मुझे परेशान कर रहे हैं। यह कभी खत्म नहीं होगा। सहयोग सार्थक होना चाहिए। केस डायरी देखे बिना अदालत को अभिषेक बनर्जी को अंतरिम सुरक्षा देने वाला आदेश नहीं देना चाहिए।”
इस पर अदालत ने जवाब दिया,
“तब आप अदालत का रुख करिए। पहले से आशंका न जताएं।”
इसके बाद हाईकोर्ट ने तीनों FIR के संबंध में अभिषेक बनर्जी को मिली मौजूदा अंतरिम सुरक्षा को 31 अगस्त या अगले आदेश तक बढ़ा दिया। हालांकि, अदालत ने यह फैसला सुरक्षित रखा कि FIR रद्द करने की उनकी याचिका के अंतिम निस्तारण तक यह सुरक्षा जारी रखी जाए या नहीं।
अदालत ने पुलिस अधिकारियों को भी निर्देश दिया कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चल रही मौजूदा आपराधिक कार्यवाहियों से संबंधित सभी FIR और संबंधित शिकायतों की प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं।
मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।
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