किरायेदारी पाने के लिए मृत किरायेदार के साथ रहना जरूरी नहीं, वारिस को मिलेगा अधिकार: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मृत किरायेदार की किरायेदारी विरासत में पाने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वारिस उसकी मृत्यु के समय उसके साथ रह रहा हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ कोई पारिवारिक सदस्य निवास नहीं कर रहा था तो उसके किसी भी वैध वारिस को किरायेदार के रूप में मान्यता दी जा सकती है।
जस्टिस एम. एम. साठये ने यह फैसला पारसी पंचायत फंड्स एंड प्रॉपर्टीज, बॉम्बे द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।
मामला एक फ्लैट की किरायेदारी से जुड़ा है। मूल किरायेदार की मृत्यु के बाद उसकी चचेरी बहन ने खुद को उसका वैध वारिस बताते हुए किरायेदार घोषित किए जाने की मांग की। उसने पारसी समुदाय पर लागू उत्तराधिकार कानून के तहत अपने अधिकार का दावा किया।
निचली अदालत ने उसके पक्ष में फैसला दिया। अपीलीय अदालत ने यह माना कि वह यह साबित नहीं कर सकी कि किरायेदार की मृत्यु के समय वह उसके साथ रह रही थी, लेकिन इसके बावजूद उसे वैध वारिस मानते हुए किरायेदारी का अधिकार बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने कहा कि बॉम्बे रेंट एक्ट, 1947 की धारा 5(11)(सी)(i) दो अलग-अलग परिस्थितियों को कवर करती है। पहली स्थिति में वह पारिवारिक सदस्य शामिल है, जो किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ रह रहा हो। दूसरी स्थिति तब लागू होती है, जब ऐसा कोई पारिवारिक सदस्य मौजूद न हो। ऐसी अवस्था में मृत किरायेदार का कोई भी वारिस किरायेदार के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकता है।
अदालत ने कहा कि कानून में प्रयुक्त या शब्द दोनों स्थितियों को अलग-अलग बनाता है। विधानमंडल ने मृत किरायेदार का कोई भी वारिस शब्दों के साथ यह शर्त नहीं जोड़ी है कि वह मृत्यु के समय किरायेदार के साथ रह रहा हो।
अदालत ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ रह रहा हो। साथ ही, किसी अन्य व्यक्ति ने खुद को उसका वारिस भी नहीं बताया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी ने अपने पारिवारिक संबंधों के पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिनका मकान मालिक प्रभावी ढंग से खंडन नहीं कर सका।
हाईकोर्ट ने कहा,
“यदि किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ कोई पारिवारिक सदस्य निवास नहीं कर रहा था, तो मृत किरायेदार का कोई भी वारिस किरायेदार की परिभाषा में शामिल होने के लिए उसके साथ रहना साबित करने के लिए बाध्य नहीं है।”
इन परिस्थितियों में अदालत ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को सही ठहराते हुए याचिका खारिज की और प्रतिवादी को संबंधित फ्लैट का वैध किरायेदार मानने के आदेश को बरकरार रखा।