सहयोग पोर्टल और सामग्री हटाने के नियमों को चुनौती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र से 29 जुलाई तक मांगा जवाब

Update: 2026-07-16 08:12 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा की याचिका पर केंद्र सरकार को 29 जुलाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिका में 'सहयोग पोर्टल' और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(डी) में वर्ष 2025 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। कामरा का दावा है कि यह व्यवस्था पर्याप्त कानूनी सुरक्षा के बिना ऑनलाइन सामग्री हटाने का रास्ता खोलती है।

एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र गूगे और जस्टिस गौतम अंखाड़ की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त को दोपहर 3 बजे तय की। साथ ही कुणाल कामरा को 6 अगस्त तक अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट नवरोज़ सीरवाई ने कहा कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार से जुड़ा है।

उन्होंने अदालत से कहा,

"यह अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार से जुड़ा है, फिर भी केंद्र सरकार ने अब तक अपना हलफनामा दाखिल नहीं किया।"

केंद्र सरकार की ओर से एडिटर सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने जवाब दाखिल करने के लिए अगस्त तक का समय मांगा, जिसका कुणाल कामरा की ओर से विरोध किया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने केंद्र को 29 जुलाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

सीनियर एडवोकेट सीरवाई ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि इसे केंद्र सरकार के लिए अंतिम अवसर दर्ज किया जाए, लेकिन कार्यवाहक चीफ जस्टिस ने ऐसा करने से इनकार किया।

कुणाल कामरा ने अपनी याचिका में कहा कि 'सहयोग पोर्टल' और नियम 3(1)(डी) के जरिए सामाजिक माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री को हटाने के लिए समानांतर व्यवस्था बनाई गई, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों को दरकिनार करती है।

याचिका के अनुसार, इस व्यवस्था के तहत उपयोगकर्ताओं को पूर्व सूचना दिए बिना उनकी सामग्री हटाई जा सकती है, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि नियम 3(1)(डी) और सहयोग पोर्टल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों से परे हैं और सुप्रीम कोर्ट के श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) के फैसले के विपरीत हैं। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि धारा 79 केवल मध्यस्थों को सीमित कानूनी संरक्षण देती है, लेकिन स्वतंत्र रूप से सामग्री हटाने की नई व्यवस्था बनाने का अधिकार नहीं देती।

कामरा ने राज्यों और विभिन्न सरकारी विभागों को सामग्री अवरुद्ध करने के निर्देश जारी करने की शक्ति दिए जाने को भी चुनौती दी। उनका कहना है कि ऐसा अधिकार संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत केवल केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

Tags:    

Similar News