ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स नियम | 60 दिन में सैंपल जांच अनिवार्य, लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश: बॉम्बे हाइकोर्ट
बॉम्बे हाइकोर्ट की नागपुर पीठ ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स नियमों के पालन में हो रही गंभीर लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई। हाइकोर्ट ने कहा कि तय समय-सीमा के भीतर दवाओं के सैंपल की जांच न होना न केवल अभियोजन को कमजोर करता है, बल्कि इससे जनस्वास्थ्य भी गंभीर रूप से प्रभावित होता है, क्योंकि घटिया गुणवत्ता की दवाएं बाजार में बनी रहती हैं।
जस्टिस एम.एम. नेरलिकर की पीठ एम/एस ऑस्कर रेमेडीज प्रा. लि. के निदेशकों अश्विनी लांबा और अन्य द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में गढ़चिरोली के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई, जिसमें याचिकाकर्ताओं पर मानक से कम गुणवत्ता की दवा बनाने का आरोप लगाया गया।
मामले के अनुसार, ड्रग इंस्पेक्टर ने 12 जुलाई, 2022 को दवा का सैंपल लिया और उसे 14 जुलाई, 2022 को सरकारी विश्लेषक के पास भेजा गया। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स नियम, 1945 के नियम 45 के तहत सरकारी विश्लेषक को 60 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट देना अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में यह समय-सीमा पूरी नहीं की गई। निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद 1 नवंबर, 2022 को विश्लेषक ने समय बढ़ाने का अनुरोध किया, जबकि दवा को “मानक के अनुरूप नहीं” घोषित करने वाली रिपोर्ट 18 जनवरी 2023 को जारी की गई।
हाइकोर्ट ने कहा कि नियम 45 के अनुसार यदि किसी कारणवश समय-सीमा का पालन संभव न हो तो अवधि समाप्त होने से पहले ठोस कारणों के साथ अनुमति लेना अनिवार्य है। समय-सीमा समाप्त होने के बाद मांगी गई अनुमति को वैध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।
कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि 18 जनवरी, 2023 को रिपोर्ट मिलने के बावजूद निर्माता को नोटिस लगभग चार महीने बाद 19 अप्रैल 2023 को भेजा गया। हाइकोर्ट ने इसे विभागीय लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण बताया।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। साथ ही कोर्ट ने ड्रग विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी लापरवाहियां अंततः घटिया दवा बनाने वाले निर्माताओं को लाभ पहुंचाती हैं और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स अधिनियम, 1940 के उद्देश्य को विफल करती हैं, जो जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए बनाया गया।
कोर्ट ने कहा कि ड्रग विभाग और उसके अधिकारी कानून के क्रियान्वयन में उदासीन नहीं रह सकते। बड़ी संख्या में मामलों में विभागीय चूक सामने आ रही है, जिससे व्यापक स्तर पर लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए हाइकोर्ट ने महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन आयुक्त को निर्देश दिया कि नियम 45 की समय-सीमा का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, कार्यभार अधिक होने की स्थिति में नई प्रयोगशालाएं स्थापित करने के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा जाए और दवाओं की जांच प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक प्रभावी ऑनलाइन व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें सैंपल और जांच रिपोर्ट रियल-टाइम आधार पर उपलब्ध हों।
हाइकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पूरी जांच प्रक्रिया को वेब पर सार्वजनिक किया जाए ताकि सभी संबंधित पक्ष जांच की स्थिति और परिणाम से अवगत रह सकें। मामले को अनुपालन की समीक्षा के लिए 4 मई 2026 को सूचीबद्ध किया गया।