बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के उस शुद्धिपत्र (Corrigendum) को सही ठहराया, जिसके तहत 'सिविल जज जूनियर डिवीजन' और 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास' की भर्ती प्रक्रिया में 1 साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस पूरी मान लेने की छूट, केवल उन लॉ ग्रेजुएट्स को दी गई, जिन्होंने 22 अगस्त, 2025 से पहले अपनी डिग्री प्राप्त की।

कोर्ट ने कहा कि 'भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए; इसका मतलब यह नहीं है कि सभी लॉ ग्रेजुएट्स को 1 साल की वास्तविक प्रैक्टिस की शर्त से छूट मिल गई।

जस्टिस सारंग वी. कोटवाल और जस्टिस रणजीतसिंह राजा भोंसले की खंडपीठ (Division Bench) उन दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें ऐसे याचिकाकर्ताओं ने दायर किया, जिन्होंने 2026 में अपनी लॉ डिग्री प्राप्त की थी। उन्होंने 'सिविल जज जूनियर डिवीजन' और 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास' की भर्ती परीक्षा के संबंध में 23 अक्टूबर, 2026 को जारी MPSC के शुद्धिपत्र को चुनौती दी थी और चयन प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगी थी।

यह शुद्धिपत्र 'भूमिका ट्रस्ट' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 21 अगस्त, 2026 के फैसले के बाद जारी किया गया। इसमें उन लॉ ग्रेजुएट्स को आवेदन करने की अनुमति दी गई, जिन्होंने 22 अगस्त, 2025 से पहले अपनी डिग्री प्राप्त कर ली थी (बशर्ते वे अन्य पात्रता शर्तों को भी पूरा करते हों)। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे ग्रेजुएट्स, और अन्य पात्र उम्मीदवार जिन्होंने 3 साल की वास्तविक कानूनी प्रैक्टिस पूरी नहीं की, उन्हें 1 साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी कर लेने वाला माना जाएगा।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 73(i) के अनुसार, संक्रमण काल ​​(Transitional Period) के दौरान सभी लॉ ग्रेजुएट्स आवेदन करने के पात्र हैं, और यह छूट केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है, जिन्होंने 22 अगस्त, 2025 से पहले डिग्री प्राप्त की। उन्होंने दलील दी कि MPSC ने डिग्री प्राप्त करने की तारीख के आधार पर अलग-अलग वर्ग बनाकर 'लॉ ग्रेजुएट्स' शब्द की गलत व्याख्या की है।

हाईकोर्ट ने 'ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' [(1993) 4 सुप्रीम कोर्ट केसेस 288] मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले की समीक्षा की। इस फैसले में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर नियुक्ति चाहने वाले उम्मीदवारों के लिए तीन साल की वकालत (प्रैक्टिस) का अनुभव होना अनिवार्य कर दिया गया।

कोर्ट ने गौर किया कि 'भूमिका ट्रस्ट' मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही के पूर्व अनुभव की मूल शर्त को नहीं हटाया था। इसके बजाय, उसने वकालत के अनुभव की शर्त को अचानक फिर से लागू किए जाने की स्थिति से निपटने के लिए एक अंतरिम व्यवस्था बनाई।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...माननीय सुप्रीम कोर्ट इस बात से सहमत नहीं था कि इस बुनियादी सवाल पर फैसले की फिर से समीक्षा की जाए कि क्या न्यायिक सेवा में आने वाले व्यक्ति के लिए अदालती कामकाज का पूर्व अनुभव होना जरूरी है... माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि अदालती कामकाज का पूर्व अनुभव होना आवश्यक है।"

कोर्ट ने पाया कि 'भूमिका ट्रस्ट' मामले के पैराग्राफ 73(i) के तहत लॉ ग्रेजुएट्स को एक साल की सक्रिय वकालत (प्रैक्टिस) पूरी कर चुका माना गया, क्योंकि जिस फैसले की समीक्षा की जा रही थी, उसे आए हुए एक साल से अधिक समय बीत चुका था। इस निर्देश में इस्तेमाल किए गए शब्द "ऐसे उम्मीदवार" (Such Candidates) को इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए; इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि यह छूट हर लॉ ग्रेजुएट को दी गई।

कोर्ट ने कहा,

"निर्देश 73(i) केवल यह नहीं कहता कि सभी लॉ ग्रेजुएट्स पात्र हो जाते हैं। इस निर्देश को पूरे तौर पर पढ़ा जाना चाहिए। इसी निर्देश 73(i) में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जिस फैसले की समीक्षा हो रही है, उसे आए हुए एक साल बीत चुका है। इसी संदर्भ में यह कहा गया कि 'ऐसे उम्मीदवारों' (इस पर जोर दिया गया) को एक साल की सक्रिय वकालत पूरी कर चुका माना जाए।"

बेंच ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को खारिज किया, जिसमें वे "लॉ ग्रेजुएट्स" और "उम्मीदवारों" के बीच अंतर करने की कोशिश कर रहे थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत एक साल की वास्तविक वकालत (प्रैक्टिस) की शर्त अभी भी अनिवार्य है।

यह पाते हुए कि MPSC का शुद्धिपत्र (Corrigendum) सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है, हाईकोर्ट ने इसमें कोई हस्तक्षेप करने से इनकार किया और दोनों याचिकाओं को खारिज किया।

Case Title: Satish Maulyawan Patole v. State of Maharashtra [Writ Petition No. 15159 of 2026] and Jinesh Jitendra Koli v. State of Maharashtra [Writ Petition No. 15160 of 2026]

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