पति का अपनी भाभी से बातचीत करना और अपने हाथ पर उनके बेटे का नाम गुदवाना, बिना किसी गलत इरादे के 'क्रूरता' नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि पति का अपनी भाभी से बातचीत करना और अपने हाथ पर उनके बेटे का नाम गुदवाना IPC की धारा 498A के दायरे में नहीं आता है, जो जीवनसाथी के प्रति क्रूरता के लिए सज़ा का प्रावधान करती है।
कोर्ट ने एक व्यक्ति की भाभी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की; पत्नी का आरोप था कि पति का भाभी के साथ 'एक्स्ट्रा-मैरिटल' अफेयर था।
सिंगल-जज जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले ने 10 जून को सुनाए गए आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता को 'शक' था कि उसके पति के संबंध याचिकाकर्ता (जो उसके चचेरे भाई की पत्नी थी) के साथ थे।
FIR में लगाए गए आरोपों में कहा गया कि पति अक्सर याचिकाकर्ता से बात या चैट करता था, उसने अपने हाथ पर उसके बेटे का नाम गुदवाया और फेसबुक पर उसकी तस्वीरें भी अपलोड करता था।
जस्टिस भोंसले ने कहा,
"ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिस पर शक किया जा सके। यह विवाद मूल रूप से पति-पत्नी के बीच का मामला लगता है। मुद्दे पति और पत्नी के बीच के हैं। शक की वजह यह बताई गई कि पति अपनी भाभी (याचिकाकर्ता) से बात/चैट करता था और उसने अपने हाथ पर उसके बेटे का नाम गुदवाया। अगर याचिकाकर्ता को चचेरे भाई की पत्नी होने के नाते रिश्तेदार माना जाए तो उसका बेटा पति का भतीजा होगा। मेरी राय में याचिकाकर्ता से बात या चैट करना या पति का उसके बेटे का नाम गुदवाना, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत 'क्रूरता' की परिभाषा में नहीं आता है।"
जज ने कहा कि इसे क्रूरता का कृत्य कहने के लिए FIR में पहली नज़र में ही उन कामों के पीछे का इरादा और गंभीरता दिखनी चाहिए। साथ ही की गई "क्रूरता" ऐसी होनी चाहिए, जिससे महिला आत्महत्या करने या खुद को गंभीर चोट पहुँचाने के लिए मजबूर हो जाए, या ऐसा व्यवहार हो जिससे शरीर के अंगों या स्वास्थ्य को गंभीर चोट या खतरा पहुँचे।
जज ने कहा,
"इस मामले में याचिकाकर्ता पर दहेज की मांग वगैरह का कोई आरोप नहीं है। अगर FIR में लगाए गए सभी आरोपों पर एक साथ और सामूहिक रूप से विचार किया जाए तो मेरी राय में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत उसके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता। जब FIR में लगाए गए आरोपों पर विचार किया जाता है तो प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि आरोपों का मुख्य केंद्र पति और उसका व्यवहार है। उस पर मारपीट, गाली-गलौज, दहेज की मांग और दहेज की मांग पूरी न होने पर परेशान करने के आरोप हैं। चार्जशीट से पता चलता है कि उसके और याचिकाकर्ता के बीच CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) हैं, लेकिन कोई ट्रांसक्रिप्ट नहीं है। उक्त संदेह का आधार बनाने के लिए कोई अन्य ठोस सामग्री या सबूत नहीं है। इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों तथा रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए, मेरी राय में केवल संदेह पर आधारित आरोपों और इसी तरह के अन्य आरोपों को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के अर्थ में क्रूरता नहीं कहा जा सकता है।"
जज ने राय दी कि संदेह विश्वसनीय सामग्री पर आधारित होना चाहिए ताकि मुकदमे के दौरान ठोस और कानूनी सबूत का आधार बन सके। सामग्री ऐसी होनी चाहिए जिसे मुकदमे के दौरान कानूनी सबूत में बदला जा सके।
जज ने राय दी,
"इस मामले में रिकॉर्ड और FIR में लगाए गए आरोपों से पता चलता है कि संदेह शिकायतकर्ता पत्नी की नैतिक धारणाओं पर आधारित है। ऐसा लगता है कि संदेह पति के व्यवहार का व्यक्तिपरक विश्लेषण और उसकी नैतिक धारणाओं पर आधारित व्यक्तिपरक संतुष्टि है। मेरी राय में संदेह ठोस सामग्री पर आधारित होने के अलावा ऐसा होना चाहिए, जो अदालत को पहली बार में ही सोचने पर मजबूर कर दे। संदेह ऐसी सामग्री पर आधारित और केंद्रित होना चाहिए, जो प्रथम दृष्टया यह संकेत दे कि यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त है कि कोई अपराध हुआ है और मुकदमा चलाया जाना चाहिए। हमेशा यह याद रखना चाहिए कि केवल निराधार संदेह कानूनी या ठोस सबूत की जगह नहीं ले सकता है।"
इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।
Case Title: ANG vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 1158 of 2021)