बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं को साबित करने के लिए RBI द्वारा गोपनीय जानकारी का इस्तेमाल करने पर कोई रोक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रभावित पक्ष, सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों से जिरह (Cross-examination) की मांग करके उनकी राय की सटीकता पर सवाल नहीं उठा सकता।

जस्टिस संदीप वी. मार्ने तीन रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। इन याचिकाओं में 'पब्लिक प्रेमिसेस (अनधिकृत कब्जेदार बेदखली) एक्ट, 1971' की धारा 5(1) के तहत, मुंबई की 'अमर बिल्डिंग' से याचिकाकर्ताओं को बेदखल करने के आदेशों को चुनौती दी गई।

1947 में जब RBI ने 'अमर बिल्डिंग' का मालिकाना हक हासिल किया, उससे पहले 1930 में ही याचिकाकर्ताओं में से एक ने वहां किरायेदार के तौर पर कब्जा कर लिया था। 1961 में, दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत कंपनियां दूसरी जगह जाने के लिए तैयार हो गईं, और बदले में RBI ने 'बॉम्बे रेंट एक्ट' के तहत 'वास्तविक जरूरत' (Bona Fide Requirement) का हवाला देकर उन्हें बेदखल न करने पर सहमति जताई। हालांकि, कंपनियां दूसरी जगह नहीं गईं और बाकी परिसर पर अपना कब्जा बनाए रखा।

2009 में RBI ने 'पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट' के तहत बेदखली की प्रक्रिया शुरू की। इसके लिए उन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और मुंबई पुलिस की सुरक्षा रिपोर्टों का सहारा लिया, जिनमें 'अमर बिल्डिंग' से उन इकाइयों को हटाने की सिफारिश की गई, जो RBI का हिस्सा नहीं थीं।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जज ने उनकी अपीलों को खारिज करके और बेदखली के आदेशों को बरकरार रखकर बड़ी गलती की। उन्होंने यह भी कहा कि RBI कोई ठोस सुरक्षा खतरा साबित नहीं कर पाया, और 1961 के समझौते के तहत RBI 'वास्तविक जरूरत' के आधार पर उन्हें बेदखल नहीं कर सकता। वहीं, RBI ने दलील दी कि 'पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट' के तहत बेदखली के लिए किसी विशेष कारण या 'वास्तविक जरूरत' को साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा रिपोर्टों पर कार्रवाई करने में जो समय लगा, उसका फायदा याचिकाकर्ताओं को नहीं मिल सकता।

अदालत ने कहा:

“RBI ने 2009 में इन दो रिपोर्टों के आधार पर कार्रवाई करने का फैसला किया और याचिकाकर्ताओं को बेदखल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। यह नहीं कहा जा सकता कि इन दो सुरक्षा रिपोर्टों पर कार्रवाई करने में RBI की ओर से हुई देरी का किसी भी तरह से याचिकाकर्ताओं को कोई फायदा मिलेगा।”

अदालत ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सुरक्षा रिपोर्ट तैयार करने वालों से पूछताछ न करना मामले के लिए घातक है। अदालत ने जोर देकर कहा कि यह कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है, जिसमें सबूतों के कड़े नियम लागू हों। अदालत ने आगे कहा कि RBI या एस्टेट ऑफिसर के लिए, सुरक्षा संबंधी धारणा बनाने के मकसद से IB और पुलिस से मिली गोपनीय जानकारी पर भरोसा करने में कोई रोक नहीं है।

अदालत ने टिप्पणी की,

“जब सुरक्षा एजेंसियां ​​सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सामने लाती हैं तो सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) के लिए खतरे की आशंका जताना उचित है। ऐसे में प्रभावित पक्ष अर्ध-न्यायिक कार्यवाही (Quasi-Judicial Proceedings) के दौरान सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों से जिरह (Cross-Examine) करके उनकी राय की सटीकता पर सवाल नहीं उठा सकता।”

अदालत ने रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों और खतरे की आशंका के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा:

“याचिकाकर्ता RBI के अधिकारी से केवल इस बात पर जिरह कर सकते हैं कि सुरक्षा रिपोर्टों से कोई सुरक्षा खतरा साबित नहीं होता... सुरक्षा एजेंसियों द्वारा दी गई सिफारिशें एक अलग बात है, और सार्वजनिक परिसर में किसी व्यक्ति के मौजूद होने से सार्वजनिक प्राधिकरण को जो खतरा महसूस होता है, वह एक अलग बात है। पहली बात (सिफारिशों) पर कोई जिरह नहीं हो सकती, जबकि दूसरी बात (खतरे की आशंका) पर जिरह की जा सकती है।”

अदालत ने आगे कहा कि जहां कोई निश्चित कार्यकाल (Tenure) नहीं है और कब्जा करने वाला व्यक्ति मासिक किरायेदारी (Monthly Tenancy) के आधार पर परिसर में रह रहा है, वहां 'ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट' की धारा 106 के तहत किरायेदारी खत्म करने के लिए कोई कारण बताने की जरूरत नहीं है।

अदालत ने कहा,

“एक बार यह स्पष्ट हो जाए कि परिसर या किरायेदारी को 'रेंट एक्ट' (Rent Act) के तहत कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है तो यह एक सामान्य मासिक किरायेदारी बन जाती है। इसे 'ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट' की धारा 106 के तहत, बिना कोई कारण बताए खत्म किया जा सकता है।”

एस्टेट ऑफिसर और सिटी सिविल कोर्ट के फैसलों में कोई त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने तीनों रिट याचिकाओं को खारिज किया।

Case Title: Munjee Nathoobhoy & Company Pvt. Ltd. v. Reserve Bank of India [Writ Petition No. 2271 of 2014] and Connected Matters.

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