बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला दोषी का वर्गीकरण बरकरार रखा, जिसे अन्य महिला की 'दहेज हत्या' में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया। कोर्ट ने उसे 'महिलाओं द्वारा किए गए अपराधों' वाली श्रेणी के बजाय 'महिलाओं के खिलाफ किए गए अपराधों' से संबंधित श्रेणी में रखा है।
कोर्ट ने कहा कि पीड़ित के मामले को पूरी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता। सजा में छूट (रेमिशन) के नियमों की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती जिससे नियमों का गलत अर्थ निकले।
जस्टिस संदीपकुमार सी. मोरे और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव की खंडपीठ रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें राज्य सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसके तहत याचिकाकर्ता को 2010 के रेमिशन नियमों की श्रेणी 2(C) और 1992 के नियमों की श्रेणी 1(d) में रखा गया। इन श्रेणियों के तहत समय से पहले रिहाई पर विचार करने के लिए 26 साल की कैद (छूट सहित) का प्रावधान है।
याचिकाकर्ता ने 2010 के नियमों की श्रेणी 1(B) के तहत वर्गीकरण की मांग की, जिसमें 20 साल की कैद का प्रावधान है। याचिकाकर्ता को 2005 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और 302 (धारा 34 के साथ) के तहत दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि श्रेणी 1(B), जो विशेष रूप से 'महिलाओं द्वारा किए गए अपराधों' से संबंधित है, उस पर लागू होनी चाहिए, क्योंकि वह एक महिला है। राज्य सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला श्रेणी 2(C) के अंतर्गत आता है। इस श्रेणी में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ किए गए वे अपराध आते हैं, जिनमें अत्यधिक हिंसा, क्रूरता शामिल हो, या जिसमें पीड़ित की मौत जलने के कारण हुई हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2010 के नियमों की श्रेणी 1(B) उन हत्याओं से संबंधित है, जो महिलाओं द्वारा पहले से योजना बनाकर या किसी गिरोह के साथ मिलकर की जाती हैं; इसमें 20 साल की कैद का प्रावधान है। इसके विपरीत, श्रेणी 2(C) में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ किए गए वे अपराध आते हैं, जिनमें अत्यधिक हिंसा या क्रूरता शामिल हो, या जहां पीड़ित की मौत जलने के कारण हुई हो; इसमें 26 साल की कैद का प्रावधान है।
अदालत ने गौर किया कि इस मामले में महिलाओं से जुड़ी दो श्रेणियों के बीच टकराव है: एक, महिलाओं द्वारा किए गए अपराधों से संबंधित, और दूसरी, महिलाओं के खिलाफ किए गए अपराधों से संबंधित। यह एक ऐसी स्थिति है, जहां पीड़ित और आरोपी दोनों ही महिलाएं हैं; अदालत ने कहा कि इन श्रेणियों को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि उनके बीच एक उचित संतुलन बना रहे।
'हरियाणा राज्य बनाम जगदीश [2010 AIR (SC) 1690]' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया कि किसी गाइडलाइन में जो श्रेणी दोषी के लिए सबसे अधिक फायदेमंद हो, उसे ही लागू किया जाए। अदालत ने कहा कि पीड़ित के पक्ष को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की,
"इसमें कोई शक नहीं कि कानून हमेशा आरोपी के पक्ष में रहा है, लेकिन पीड़ित पर भी कुछ ध्यान दिया जाना चाहिए। पीड़ित के मामले को पूरी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता। ऐसा करना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा... किसी दृष्टिकोण को उदार मानने या उसका फायदा उठाने वाले तरीके से अर्थ निकालने का मतलब यह नहीं है कि आप गलत दृष्टिकोण अपनाएं या सजा में छूट (Remission) के लिए जारी गाइडलाइंस को गलत तरीके से लागू करें।"
खंडपीठ ने गौर किया कि 2010 की गाइडलाइंस में 'श्रेणी 2(C)' को इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि उस समय जलने के कारण दहेज मौतों के मामले बहुत अधिक सामने आ रहे थे। इसका उद्देश्य ऐसे अपराधों को रोकने के लिए लंबी जेल की सजा का प्रावधान करना था।
चूंकि पीड़ित की मौत जलने के कारण हुई, इसलिए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता का मामला 'श्रेणी 2(C)' के अंतर्गत आता है, भले ही याचिकाकर्ता खुद एक महिला क्यों न हो।
अदालत ने कहा:
"पीड़ित की मौत जलने के कारण हुई थी और 'श्रेणी 2(C)' विशेष रूप से 'जलने के कारण हुई मौत' से संबंधित है। ऐसी स्थिति में संतुलित व्याख्या की आवश्यकता है। इसलिए हम याचिकाकर्ता के मामले को 2010 की गाइडलाइंस की 'श्रेणी 2(C)' में रखना उचित समझते हैं।"
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता को 2010 की सजा में छूट (Remission) संबंधी गाइडलाइंस की 'श्रेणी 2(C)' में रखने के राज्य सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
Case Title: Ashabai Puna Tayade v. State of Maharashtra [Criminal Writ Petition No. 1193 of 2026]