वेतन न देना कर्मचारियों के अनुच्छेद 14, 21 और 19(1)(g) के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि कर्मचारियों को वेतन का भुगतान न करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 19(1)(g) के तहत मिले उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी संस्थान अपने कर्मचारियों का वेतन रोककर उनके हितों के खिलाफ काम नहीं कर सकता और न ही उनका शोषण कर सकता है, क्योंकि वेतन उनकी आजीविका और जीवनयापन का बुनियादी साधन है।
जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की खंडपीठ सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी (STES) के शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की याचिकाओं तथा वेतन भुगतान से संबंधित पूर्व आदेशों की कथित जानबूझकर अवहेलना को लेकर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
772 पूर्व कर्मचारियों का करीब ₹21 करोड़ बकाया
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि 19 रिट याचिकाओं और उनसे जुड़ी अवमानना याचिकाओं में 772 पूर्व कर्मचारी शामिल हैं। इनमें वे कर्मचारी भी हैं, जिन्होंने इस्तीफा दे दिया था या जिन्हें सेवा से हटा दिया गया था। इनमें 110 कर्मचारियों को कथित तौर पर नौकरी से निकाला गया था।
इन कर्मचारियों का लगभग ₹21 करोड़ वेतन बकाया बताया गया। सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि बकाया राशि का भुगतान 31 अगस्त 2026 तक कर दिया जाएगा।
इस आश्वासन को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने सोसाइटी को निर्देश दिया कि वह हलफनामे के रूप में एक वचनपत्र दाखिल करे, जिसमें निर्धारित समयसीमा के भीतर सभी 772 कर्मचारियों का बकाया भुगतान करने की पुष्टि की जाए।
22 महीने से वेतन न मिलने पर कोर्ट ने जताई चिंता
कोर्ट ने उन कर्मचारियों के मामले पर भी चिंता जताई, जो अभी भी संस्थान में काम कर रहे हैं, लेकिन जिनका वेतन कथित तौर पर 22 महीने से अधिक समय से लंबित है।
इस संबंध में हाईकोर्ट ने संयुक्त शिक्षा निदेशक (Joint Director of Education) को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि शैक्षणिक संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों को अपना वेतन पाने के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें। पीठ ने कहा कि ये सामान्य मुकदमे नहीं हैं, क्योंकि इनका सीधा संबंध बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आजीविका से है।
वेतन नहीं मिलने से कर्मचारियों की आत्महत्या का दावा
सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से यह भी दलील दी गई कि वेतन का भुगतान नहीं होने के कारण चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों सहित कई कर्मचारियों ने आत्महत्या कर ली। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से दर्ज किया। अदालत को यह भी बताया गया कि इस संबंध में आपराधिक कार्यवाही लंबित है।
पीठ ने टिप्पणी की कि मामले में उठाए गए मुद्दे बेहद गंभीर हैं, क्योंकि वे बड़ी संख्या में संस्थान के कर्मचारियों की आजीविका से सीधे जुड़े हैं। कोर्ट ने कर्मचारियों की ओर से आत्महत्या किए जाने के दावे पर गहरा खेद भी व्यक्त किया।
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
संविधान के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“वेतन का भुगतान न करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत याचिकाकर्ताओं को प्राप्त बुनियादी मौलिक अधिकारों का सीधे उल्लंघन है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(g) के साथ पढ़ा जाना चाहिए।”
कोर्ट ने आगे कहा कि कानून के शासन में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति या संस्थान कर्मचारियों के अधिकारों का इस तरह खुलेआम उल्लंघन नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार अपने कामकाज का संचालन करने वाले किसी शैक्षणिक संस्थान से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।