बॉम्बे हाईकोर्ट ने नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) को निर्देश दिया कि वह सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों पर कचरा और गंदगी जमा होने से रोकने या उसे साफ करने में नाकाम रहने वाले वार्ड अधिकारियों और उनके मातहत अधिकारियों की जवाबदेही तय करें। कोर्ट ने नगर निगम से यह भी कहा कि वह अवैध रूप से कचरा फेंकने वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), MMC Act और पर्यावरण कानूनों के तहत मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू करे।

जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की डिवीजन बेंच एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका MCGM और अलग-अलग वार्डों के अधिकारियों द्वारा नियमों का पालन न करने और सार्वजनिक सड़कों पर कचरा और गंदगी जमा होने से रोकने या उसे साफ करने में पूरी तरह निष्क्रिय रहने के मुद्दों पर थी।

कोर्ट ने रिकॉर्ड में रखी गई तस्वीरों को देखा, जिनमें सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों की हालत दिखाई गई, और कहा:

"तस्वीरों को देखना वाकई परेशान करने वाला है। कोर्ट को बार-बार भरोसा दिलाने के बावजूद, ऐसा लगता है कि सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों आदि से कचरा और अवैध रूप से फेंके गए कचरे को साफ करने के मामले में नगर निगम का तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय है।"

कोर्ट ने पाया कि ज़मीनी स्तर पर नगर निगम का तंत्र कचरा साफ करने और अवैध डंपिंग को रोकने में निष्क्रिय दिख रहा था, और CCTV कैमरों का इस्तेमाल और निगरानी केवल कागजी वादे बनकर रह गए।

इसके अनुसार, कोर्ट ने नगर आयुक्त को निर्देश दिया कि वे उन सभी वार्ड अधिकारियों और उनके मातहत अधिकारियों की जवाबदेही तय करें, जो ऐसी डंपिंग को रोकने या सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों पर जमा कचरे और गंदगी को साफ करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं कर रहे थे। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर स्वास्थ्य और स्वच्छता बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों के नामों का ब्योरा देने वाला एक हलफनामा पेश किया जाए, ताकि जवाबदेही तय की जा सके।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...नगर निगम को ऐसे लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) के साथ-साथ MMC एक्ट और पर्यावरण कानून के संबंधित प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी... जब तक कानून के मुताबिक ऐसी सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक इस तरह की सार्वजनिक परेशानी पैदा करने वाले मनमाने लोगों को अनुशासित नहीं किया जा सकेगा।"

सिंगापुर में लागू किए गए उपायों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि आखिरकार यह कानून बनाने वालों का काम है कि वे सार्वजनिक सड़कों और खुली जगहों पर कचरा फेंकने की समस्या से निपटने के लिए कड़े नियम बनाने पर विचार करें।

कोर्ट ने कहा,

"राज्य सरकार को इस मामले में एक जैसी पॉलिसी नोटिफ़ाई करने की ज़रूरत है, ताकि सभी म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और खासकर मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहर इसे लागू कर सकें।"

कोर्ट ने कांजुरमार्ग डंपिंग ग्राउंड से आने वाली बदबू के बारे में शिकायतों पर भी गौर किया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत करने के लिए जो फ़ॉर्म दिया गया, उसका तरीका ऐसा है कि ईमेल से की गई ज़रूरी शिकायतों को रजिस्टर करना ही नामुमकिन है। इसलिए कोर्ट ने संबंधित पक्ष को ईमेल से शिकायतें स्वीकार करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा,

"हमें यह देखकर हैरानी हुई कि शिकायत करने का जो सिस्टम दिया गया, वह पूरी तरह से बेकार है... एक असरदार शिकायत सिस्टम न सिर्फ़ किसी भी मंज़ूर तरीके से की गई शिकायत को रजिस्टर करेगा, बल्कि उस पर कार्रवाई भी करेगा और यह पक्का करेगा कि डंपिंग साइट पर तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। साथ ही शिकायत करने वाले को यह भी बताया जाए कि क्या गड़बड़ हुई और क्या सुधार के उपाय किए गए।"

डंपिंग ग्राउंड से निकलने वाली बदबू को गंभीर पर्यावरण प्रदूषण मानते हुए और नागरिकों के प्रदूषण-मुक्त वातावरण के मौलिक अधिकार पर इसके बुरे असर को देखते हुए कोर्ट ने संबंधित पक्ष को यह पक्का करने का निर्देश दिया कि डंपिंग साइट से किसी भी तरह की बदबू या प्रदूषण न फैले।

कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रह गए और MCGM को निर्देश दिया कि कचरे को अलग-अलग करने के नियमों को हर मुमकिन जगह पर लागू किया जाए। कोर्ट ने म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को यह भी निर्देश दिया कि नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए नागरिकों और विशेषज्ञों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक ग्रुप टास्क फ़ोर्स और वार्ड-वाइज़ सिस्टम बनाने पर विचार करे।

अधिकारियों द्वारा निर्देशों के पालन की जानकारी रिकॉर्ड पर रखने के लिए सुनवाई 7 अक्टूबर, 2026 तक टाल दी गई। कोर्ट ने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह भी निर्देश दिया कि वह कांजुरमार्ग डंपिंग साइट से बदबू और प्रदूषण से जुड़ी शिकायतों पर कड़ी नज़र रखे और जनता के लिए ऐसी शिकायतें दर्ज कराने का सिस्टम बनाए।

Case Title: Kannamwar Co-op. Hsg. Soc. Association Ltd. v. Union of India [Writ Petition No. 790 of 2018]

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