बालिग महिला अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र, माता-पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज: आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने दोहराया कि यदि महिला बालिग है तो उसे अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का पूरा अधिकार है।
अदालत ने माता-पिता द्वारा अपनी बेटी को वापस दिलाने के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज की।
जस्टिस चीकाटी मानवेंद्रनाथ रॉय और जस्टिस तुहिन कुमार गेदेला की खंडपीठ ने कहा कि जब महिला ने अपनी इच्छा से विवाह किया है और पति के साथ रहने का निर्णय लिया है तो इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
“चूंकि वह बालिग है और अपनी इच्छा से प्रतिवादी नंबर 7 से विवाह कर चुकी है तथा उसके साथ रहने की इच्छा व्यक्त की। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। बालिग होने के कारण उसे यह निर्णय लेने का पूरा अधिकार है कि वह किसके साथ रहना चाहती है।”
मामले में याचिकाकर्ता माता-पिता ने अदालत से कहा था कि उनकी बेटी, जो अमरावती स्थित वेल्लोर प्रौद्योगिकी संस्थान में इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष की छात्रा है, जनवरी 2026 से घर से लापता है और प्रतिवादी नंबर 7 उसे अपने साथ ले गया।
उन्होंने पुलिस को निर्देश देने की मांग की कि उनकी बेटी को अदालत के सामने पेश किया जाए।
जब युवती को अदालत में पेश किया गया तो उसने स्पष्ट रूप से बताया कि वह अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई, क्योंकि वह प्रतिवादी नंबर 7 से प्रेम करती है।
उसने अदालत को बताया कि जनवरी 2026 में उसने चर्च में उससे विवाह किया और बाद में विवाह का प्रमाण प्राप्त करने के लिए दोबारा शादी की औपचारिकता भी पूरी की।
युवती ने यह भी कहा कि वह अपनी इच्छा से अपने पति के साथ रह रही है और उस पर किसी प्रकार का दबाव या बंधन नहीं है। उसने अपने माता-पिता के पास वापस जाने से भी इनकार किया।
माता-पिता ने अदालत को यह भी बताया कि अगस्त, 2025 में जब उनकी बेटी नाबालिग थी तब प्रतिवादी नंबर 7 ने उसे गर्भवती कर दिया और इसके समर्थन में उन्होंने मेडिकल दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।
इस पर हाइकोर्ट ने कहा कि यदि इस संबंध में कोई कानूनी शिकायत है तो माता-पिता कानून के तहत उपलब्ध अन्य उचित उपायों का सहारा ले सकते हैं लेकिन यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करने का आधार नहीं बन सकता।
इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की।