गंभीर दुराचार न होने पर पति का पत्नी के साथ फिर से रहने से इनकार करना, HMA की धारा 23(1)(a) के तहत 'गलती' नहीं मानी जाएगी: एपी हाईकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के आदेश (Decree) के बाद पति या पत्नी का साथ रहने से सिर्फ़ "इनकार" करना, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(a) के अर्थ में "गलती" नहीं माना जाएगा, जिससे उस पति या पत्नी को तलाक़ मांगने के अधिकार से वंचित किया जा सके।
कोर्ट ने कहा कि धारा 23(1)(a) के अर्थ में 'गलती' माने जाने के लिए, जिस आचरण का आरोप लगाया गया, वह फिर से साथ रहने के प्रस्ताव पर सहमत होने से सिर्फ़ इनकार करने से कहीं ज़्यादा होना चाहिए। यह इतना गंभीर दुराचार होना चाहिए जो कानून के तहत अन्यथा उपलब्ध राहत से वंचित करने के लिए पर्याप्त हो।
धारा 13(1A)(ii) के तहत, पति या पत्नी में से कोई भी तलाक़ मांग सकता है, यदि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक समय तक वैवाहिक अधिकारों की बहाली नहीं हुई हो। हालांकि, धारा 23(1)(a) उस स्थिति में राहत देने से रोकती है, जब तलाक़ मांगने वाला पक्ष अपनी ही "गलती" का फ़ायदा उठाता हुआ पाया जाए।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ ने आगे कहा कि पति की पत्नी को वापस लाने की कथित अनिच्छा को कानूनी "गलती" के रूप में नहीं माना जा सकता, जो उसे विवाह भंग करने का अधिकार खोने का कारण बने; विशेष रूप से तब, जब पत्नी द्वारा पेश किए गए सबूत पति की ओर से किसी भी गंभीर दुराचार को साबित करने में विफल रहे हों।
कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह वर्षों से टूटा हुआ था, अपील लंबित रहने के दौरान दोनों पक्ष अलग-अलग रहते रहे और पत्नी ने CPC के आदेश XXI नियम 31 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के आदेश का पालन करने के लिए कभी कोई कदम नहीं उठाया। यह मानते हुए कि धारा 13(1A)(ii) के तहत वैधानिक आधार पूरा हो गया, कोर्ट ने विवाह को भंग कर दिया। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 (1) (a) में यह प्रावधान है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत किसी भी कार्यवाही में, चाहे उसका बचाव किया गया हो या नहीं, यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि राहत देने के लिए निर्धारित आधारों में से कोई एक आधार मौजूद है और याचिकाकर्ता किसी भी तरह से ऐसी राहत प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनी ही किसी गलती या अक्षमता का लाभ नहीं उठा रहा है तो ऐसे मामले में—अन्यथा नहीं—न्यायालय तदनुसार ऐसी राहत का आदेश (डिक्री) देगा... धर्मेंद्र कुमार (उपर्युक्त) मामले में आगे यह भी कहा गया कि किसी आचरण को 'गलती' (Wrong) मानने के लिए वह आचरण केवल सुलह या पुनर्मिलन के प्रस्ताव को स्वीकार करने की अनिच्छा से कहीं अधिक गंभीर होना चाहिए। यह एक ऐसा गंभीर दुराचरण होना चाहिए, जो मांगी गई राहत को अस्वीकार करने का उचित आधार बन सके, जबकि अन्यथा वह व्यक्ति उस राहत का हकदार होता।
हाईकोर्ट ने इस बात को दोहराया कि धारा 23(1)(a) की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि वह धारा 13(1A) के तहत तलाक मांगने के वैधानिक अधिकार को ही निष्प्रभावी कर दे। साथ ही यह भी कहा कि जिस आचरण के बारे में शिकायत की गई, वह इतना गंभीर होना चाहिए कि उसके आधार पर राहत को अस्वीकार किया जा सके।
यह मामला पक्षों के बीच वैवाहिक विवादों से उत्पन्न हुआ था, जो पिछले कई वर्षों से अलग-अलग रह रहे थे। उनके बीच हुई पिछली कानूनी कार्यवाही के परिणामस्वरूप, पति की तलाक की याचिका खारिज की गई और पत्नी के पक्ष में 'दांपत्य अधिकारों की बहाली' (Restitution of Conjugal Rights) का आदेश (डिक्री) पारित किया गया। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तलाक की मांग की। उसने यह आधार प्रस्तुत किया कि हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13(1A)(ii) के तहत निर्धारित वैधानिक अवधि बीत जाने के बावजूद, दांपत्य अधिकारों की कोई बहाली नहीं हो पाई।
पत्नी ने इस याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि उसने वैवाहिक जीवन को पुनः शुरू करने के लिए बार-बार प्रयास किए थे, परंतु पति ने उसे वैवाहिक घर में वापस लेने से इनकार किया। यह तर्क दिया गया कि पति ने स्वयं ही न्यायालय के आदेश (डिक्री) के अनुपालन में बाधा डाली थी। इसलिए वह धारा 23(1)(a) के तहत अपनी ही गलती का लाभ उठाकर तलाक की मांग नहीं कर सकता।
दूसरी ओर, पति ने यह तर्क दिया कि यह बात स्वीकार्य है कि न्यायालय के आदेश का अनुपालन निर्धारित वैधानिक अवधि से अधिक समय तक नहीं हो पाया, परंतु उसकी ओर से कोई भी ऐसा "गलत कार्य" (Wrong) सिद्ध नहीं हुआ है जिसे कानून की दृष्टि में अपराध या गलती माना जा सके।
साक्ष्यों की जांच करने पर हाईकोर्ट को पत्नी और उसके गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां (Inconsistencies) मिलीं। पीठ ने यह निर्णय दिया कि उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य इस बात को विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं कर पाए कि न्यायालय का आदेश पारित होने के बाद पति ने जानबूझकर उस आदेश के अनुपालन में किसी प्रकार की बाधा डाली थी।
अदालत ने आगे यह भी कहा कि भले ही सबूतों को पूरी तरह से मान भी लिया जाए, तब भी उनसे केवल पति की ओर से तुरंत साथ रहना फिर से शुरू करने की "अनिच्छा" ही ज़ाहिर होती है; इसे इतना गंभीर दुराचार नहीं माना जा सकता कि धारा 23(1)(a) के तहत तलाक़ देने से इनकार किया जाए।
अंततः अदालत ने यह फ़ैसला दिया कि फ़ैमिली कोर्ट ने पति के ख़िलाफ़ ग़लत तरीक़े से धारा 23(1)(a) का हवाला देकर तलाक़ देने से इनकार करने में ग़लती की थी।
अपील स्वीकार की गई और दोनों पक्षकारों के बीच विवाह को भंग कर दिया गया।
Case Title: X v.Y