वोटर किसी सीट को 'डी-रिज़र्व' की मांग करके सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार नहीं मांग सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
डिलिमिटेशन एक्ट, 2002 की धारा 9(1)(c) की वैधता बरकरार रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई वोटर किसी निर्वाचन क्षेत्र (सीट) को 'डी-रिज़र्व' करने की मांग करके सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार नहीं मांग सकता।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा,
"वोट देने के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि वोटर किसी सीट के आवंटन की शर्तें तय कर सकता है या इस बात पर ज़ोर दे सकता है कि कोई सीट किसी खास श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए ही आवंटित की जाए।"
डिलिमिटेशन एक्ट, 2002 की धारा 9(1)(c) में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उन क्षेत्रों में सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है, जहां कुल आबादी में उनकी आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है।
याचिकाकर्ता ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर चुनौती दी थी कि सीट बनने के बाद से लगभग छह दशकों तक अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित रही है, जिससे उसे पीढ़ियों से केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के पक्ष में "जाति-आधारित वोट" देने के लिए मजबूर होना पड़ा। तर्क दिया गया कि उसे सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का यह तर्क कि उसे सशर्त वोटिंग के लिए मजबूर किया गया, बेबुनियाद था, क्योंकि वोट देने का अधिकार वोटरों को सीटों के आवंटन की शर्तें तय करने का अधिकार नहीं देता।
कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 के तहत वोट देने का अधिकार तय सीमाओं के अधीन है। यह मानते हुए कि संसद को चुनाव से संबंधित कानून बनाने का अधिकार है, कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का वोट देने का अधिकार संसद द्वारा बनाए गए ऐसे कानूनों के अधीन है।
कोर्ट ने 'राजबाला और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि वोट देने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए, जो आबादी के अनुपात में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"याचिकाकर्ता के वकील की यह दलील कि उनका चुनाव क्षेत्र दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रहा है, जिससे उन्हें सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार से वंचित होना पड़ा और उन्हें 'शर्तों के साथ वोट' देने के लिए मजबूर होना पड़ा, इसमें भी कोई दम नहीं है।"
Case Title: Jagdish Singh v. Election Commission of India Through Chief Election Commissioner 2026 LiveLaw (AB) 375