पेड़ काटने की अनुमति से इनकार से पहले सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1976 की धारा 5 के तहत यदि सक्षम प्राधिकारी किसी व्यक्ति के पेड़ काटने या हटाने के आवेदन को खारिज करना चाहता है, तो उससे पहले आवेदक को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि धारा 5(2) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि बिना सुनवाई का अवसर दिए अनुमति को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अधिकारी धारा 5(1) के तहत प्राप्त रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं है, तो वह आगे जांच कर सकता है, लेकिन बिना सुनवाई के आवेदन खारिज करना कानून के विपरीत है।
मामले में याचिकाकर्ता, जो शारदा इन्वेस्टमेंट कंपनी लिमिटेड, कोलकाता के प्रतिनिधि हैं, ने उप प्रभागीय वन अधिकारी के समक्ष 10 सागौन (टीकवुड) के पेड़ काटने की अनुमति मांगी थी। जांच रिपोर्ट में यह पाया गया कि जमीन याचिकाकर्ता की कंपनी के नाम पर है और स्थल निरीक्षण भी किया गया था।
इसके बावजूद प्राधिकरण ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि जमीन विवादित है और मामला हाईकोर्ट तथा सिविल कोर्ट, तहसील भाटपार रानी, जिला देवरिया में लंबित है। इससे आहत होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित भूमि कंपनी के नाम पर दर्ज है और किसी भी न्यायालय द्वारा कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस संपत्ति से संबंधित कोई मामला हाईकोर्ट में लंबित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 4 में पेड़ों की कटाई और हटाने पर प्रतिबंध का प्रावधान है, जबकि धारा 5 में अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसके अलावा, धारा 10 के तहत उल्लंघन की स्थिति में छह महीने तक की सजा या एक हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि प्राधिकरण ने न तो कोई अतिरिक्त जांच की और न ही याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिया, जो कि कानून के अनुरूप नहीं है।
अंततः कोर्ट ने प्राधिकरण की कार्रवाई को अवैध मानते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया और याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह सभी लंबित मामलों का खुलासा करते हुए तथा संपत्ति की स्पष्ट सीमांकन जानकारी के साथ पुनः आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।