UP Police Rules | कर्मचारी का जवाब मांगे बिना जांच रिपोर्ट से सहमत होने से अनुशासनात्मक कार्यवाही अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-06 14:53 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक अधिकारी का 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) में जांच अधिकारी के निष्कर्षों से सहमति जताना, बाद में दिए गए सजा के आदेश को अमान्य नहीं करता। कोर्ट ने माना कि ऐसी सहमति 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की एक पूर्व-शर्त है।

कोर्ट ने देखा कि सजा के लिए जांच अधिकारी की सिफारिश का स्पष्ट रूप से 'यू.पी. पुलिस ऑफिसर्स ऑफ सबऑर्डिनेट रैंक्स (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स, 1991' के नियम 14(1) के अपेंडिक्स I में प्रावधान है।

कोर्ट के अनुसार, 1991 के नियमों के नियम 14(1) का अपेंडिक्स I जांच अधिकारी पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह अनुशासित बल के सदस्य के दोष के आधार पर प्रस्तावित सजा की सिफारिश करे, और यह भी जरूरी है कि वह सिफारिश अलग से की जाए।

जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा,

"अनुशासनात्मक अधिकारी ने याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रस्तावित सजा से कोई सहमति नहीं जताई है, बल्कि जांच अधिकारी द्वारा दर्ज निष्कर्षों से अपनी सहमति जताई है। वैसे भी, अनुशासनात्मक अधिकारी के लिए यह एक पूर्व-शर्त है कि वह इस बात से संतुष्ट हो कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज निष्कर्ष सही हैं और रिकॉर्ड में उपलब्ध तार्किक सबूतों पर आधारित हैं। जब तक अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा वह सहमति दर्ज नहीं की जाती, तब तक वह 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता। इसलिए अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा दर्ज वह सहमति याचिकाकर्ता के खिलाफ 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने का एक बुनियादी पैमाना थी। ऐसे 'कारण बताओ नोटिस' को जारी करते समय उस सजा का प्रस्ताव करना भी एक पूर्व-आवश्यकता है, जो याचिकाकर्ता को दी जा सकती है।"

याचिकाकर्ता देवरिया की रिजर्व पुलिस लाइन्स में कांस्टेबल के पद पर तैनात था। NCC गार्ड के तौर पर ड्यूटी पर होने के बावजूद, वह विभाग को सूचित किए बिना ड्यूटी से चला गया। वह मछली हट्टा बाजार में देसी शराब की दुकान के पास पुलिस की वर्दी में नशे की हालत में पाया गया और 12 दिन, 4 घंटे और 15 मिनट की अनुपस्थिति के बाद ही वापस लौटा।

उसे उसी दिन 14 फरवरी 2011 की तारीख वाली चार्जशीट दी गई। उसने जवाब देने के लिए दो बार समय मांगा लेकिन कोई जवाब दाखिल नहीं किया। वह जांच अधिकारी के सामने पेश हुआ और उसके बाद दूर रहा, जिससे गवाहों से जिरह (Cross-Examination) नहीं हो सकी। जांच एकतरफा (Ex Parte) पूरी हुई और 31 दिसंबर 2011 की रिपोर्ट में आरोप साबित माने गए। रिपोर्ट की कॉपी के साथ नौकरी से निकालने का प्रस्ताव देने वाला 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) जारी किया गया और उनके अनुरोध पर सफाई देने के लिए और समय भी दिया गया, लेकिन कोई सफाई नहीं आई। 13 फरवरी 2012 के आदेश से उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उनकी अपील और रिवीजन याचिका खारिज की गई।

हाई कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्हें पर्याप्त मौका नहीं दिया गया और अनुशासनात्मक अधिकारी ने 'कारण बताओ नोटिस' के जवाब पर विचार नहीं किया। उन्होंने तर्क दिया कि जांच अधिकारी ने निष्कर्ष दर्ज किए थे और सजा की सिफारिश भी की थी, जिससे अनुशासनात्मक अधिकारी पहले ही सहमत हो चुका था, इसलिए सजा का आदेश गलत (Vitiated) था।

कोर्ट ने पाया कि 'कारण बताओ नोटिस' में कुछ भी गलत नहीं था, जिसमें केवल यह दर्ज था कि आरोप साबित हो गए। कोर्ट ने देखा कि अनुशासनात्मक अधिकारी उन निष्कर्षों से सहमत था, और उसी के अनुसार नौकरी से निकालने का प्रस्ताव दिया गया। जांच रिपोर्ट पर आते हुए कोर्ट ने माना कि दोषी होने के निष्कर्ष और सजा की सिफारिश वास्तव में अलग-अलग दर्ज किए गए, जैसा कि अपेंडिक्स I में जरूरी है।

कोर्ट ने देखा कि याचिका के साथ लगी जवाब की कॉपी में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे पता चले कि वह कभी अनुशासनात्मक अधिकारी तक पहुंची थी।

"...न तो उस पर कोई तारीख है और न ही कोई ऐसी पावती (Acknowledgment) है जिससे यह साबित हो सके कि अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा विवादित आदेश पारित किए जाने से पहले याचिकाकर्ता ने इसे कभी जमा किया था।"

चूंकि 'कारण बताओ नोटिस' का कोई जवाब नहीं दिया गया, इसलिए कोर्ट ने माना कि अनुशासनात्मक अधिकारी का यह निष्कर्ष सही था कि याचिकाकर्ता के पास निष्कर्षों या प्रस्तावित सजा के खिलाफ देने के लिए कोई सफाई नहीं थी।

जांच अधिकारी या अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई गैर-कानूनी बात न पाते हुए कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।

Case Title: Sant Ram Gautam Constable v. State Of U.P.Thru Secy And Ors.

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