जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग नहीं है, राज्य गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के आधार पर बोली खारिज करने के लिए स्वतंत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सस्पेंशन ऑर्डर को यूं ही ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब सस्पेंशन ऑर्डर किसी जांच के अधीन हो।
हालांकि, कोर्ट ने एक तकनीकी बोली खारिज किए जाने के फैसले को सही ठहराया, क्योंकि कोर्ट ने पाया कि पिछला खराब प्रदर्शन जनहित में बोली खारिज करने का एक वैध आधार है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने फैसला दिया:
"हमारी राय में जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के बराबर नहीं होता। हम उन तमाम मिसालों (Precedents) को ध्यान में रख रहे हैं, जिनमें यह माना गया कि किसी भी ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के गंभीर और दूरगामी परिणाम होते हैं। संवैधानिक अदालतों ने तो कई बार इसे किसी संस्था की 'नागरिक मृत्यु' (Civil Death) तक करार दिया। इसलिए मौजूदा मामले में जिस तरह का सस्पेंशन ऑर्डर है, उसे यूं ही हल्के-फुल्के ढंग से या मनमाने तरीके से ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के रूप में नहीं समझा जा सकता, जैसा कि इस मामले में करने की कोशिश की जा रही है।"
संक्षेप में कहें तो, उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के लिए विभिन्न वायरलेस उपकरणों—जैसे कि डिजिटल VHF बेस/मोबाइल ट्रांससीवर सेट, डिजिटल हैंडहेल्ड VHF ट्रांससीवर आदि—की खरीद के लिए याचिकाकर्ता की तकनीकी बोली (Technical Bid) खारिज कर दी गई। याचिकाकर्ता की अपील (Representation) भी खारिज कर दी गई।
इससे पहले कि याचिकाकर्ता टेंडर के लिए आवेदन कर पाता, महाराष्ट्र सरकार ने इसी तरह के काम के संबंध में उपकरणों की गुणवत्ता को लेकर याचिकाकर्ता के खिलाफ एक सस्पेंशन ऑर्डर जारी कर दिया था। इसी सस्पेंशन ऑर्डर के आधार पर, याचिकाकर्ता की तकनीकी बोली खारिज कर दी गई।
इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने पाया कि बोली खारिज होने का आदेश जारी होने के बाद याचिकाकर्ता ने सबसे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया और सस्पेंशन ऑर्डर के खिलाफ अंतरिम राहत की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार किया।
विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि उस सस्पेंशन ऑर्डर का अन्य राज्यों द्वारा जारी किए गए टेंडरों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी पाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर मौजूदा रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार को सफल बोलीदाता (Successful Bidder) के साथ अनुबंध करने से रोकने के लिए एक अंतरिम रोक (Interim Stay) का आदेश प्राप्त कर लिया था।
डिवीजन बेंच ने पाया कि महाराष्ट्र सरकार के सस्पेंशन ऑर्डर में याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने के लिए 'उचित कारण' (Good Cause) दर्ज किया गया।
हालांकि, सस्पेंशन ऑर्डर के गुण-दोष में जाए बिना और यह देखते हुए कि सस्पेंशन ब्लैकलिस्टिंग से पहले का एक कदम है, कोर्ट ने यह फैसला दिया:
“इस कोर्ट को यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि कोई भी सस्पेंशन ऑर्डर अपने आप में ब्लैकलिस्टिंग का ऑर्डर नहीं माना जा सकता, क्योंकि आम तौर पर ब्लैकलिस्टिंग की प्रक्रिया में 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत' (Principles of Natural Justice) शामिल होते हैं, जैसा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स द्वारा दिए गए कई फैसलों में कहा गया।”
यह देखते हुए कि सस्पेंशन ऑर्डर जारी करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया, कोर्ट ने फैसला दिया कि इसे ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के बराबर नहीं माना जा सकता। ऐसे ऑर्डर का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि सस्पेंड की गई पार्टी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
"इस प्रकार, याचिकाकर्ता की टेक्निकल बिड को खारिज करने का प्रतिवादी-राज्य का कदम इस नेक इरादे वाली धारणा पर आधारित है कि सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के बराबर था। इसलिए इसे मनमाना ऑर्डर या किसी गलत इरादे से पारित किया गया ऑर्डर नहीं माना जा सकता।"
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र राज्य द्वारा जारी सस्पेंशन ऑर्डर के आधार पर याचिकाकर्ता के काम की गुणवत्ता को लेकर यूपी के अधिकारियों की आशंका बेबुनियाद नहीं है।
राज्य की चुनने की आज़ादी पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि ये उपकरण पुलिस ऑपरेशन्स के लिए हैं, जो उत्तर प्रदेश जैसे विशाल क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एक अहम हिस्सा है।
बेंच ने फैसला दिया कि "उपकरणों की गुणवत्ता और सप्लाई के बाद की सर्विस और रखरखाव के मानकों के साथ किसी भी हाल में कोई छेड़छाड़ या समझौता नहीं किया जा सकता।" कोर्ट ने आगे कहा कि टेंडर देने वाले या मालिक को अपने उपकरण और उनके सप्लायर को चुनने में कुछ हद तक छूट और आज़ादी दी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले - म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, उज्जैन बनाम BVG इंडिया लिमिटेड - का हवाला देते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक तकनीकी विशेषज्ञ किसी बोली लगाने वाले के पिछले खराब प्रदर्शन को सही वजह मानते हुए ध्यान में रख सकता है।
काम या सामान की खराब गुणवत्ता से जनता को भारी परेशानी हो सकती है, इसलिए जनहित की रक्षा के लिए बोली को खारिज करना सही ठहराया जा सकता है।
कोर्ट ने मूल्यांकन समिति की तकनीकी विशेषज्ञता की जगह अपनी राय देने से भी यह देखते हुए इनकार किया कि उसके पास टेंडर की खास ज़रूरतों और आवश्यकताओं की जांच करने के लिए ज़रूरी विशेषज्ञता नहीं है।
आगे कहा गया,
"कोर्ट हमेशा से यह एक जैसा रुख अपनाते रहे हैं कि टेंडर प्रक्रिया में तब तक कोई दखल नहीं दिया जाना चाहिए, जब तक कि प्रभावित पक्ष द्वारा बदनीयती, मनमानी और अतार्किकता के खास आधार पेश न किए गए हों या दिखाए न गए हों। हमें इस मौजूदा याचिका में याचिकाकर्ता द्वारा ऐसे कोई आधार पेश किए गए या दिखाए गए नहीं मिले।"
तदनुसार, याचिकाकर्ता की बोली खारिज करने के फैसले को सही ठहराया गया और रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case title - Vertel Digital Pvt. Ltd. Thru. Authorized Director Shri Ramneek Chopra and another vs. State of U.P. Thru. Addl. Chief Secy. Deptt. of Home U.P. Lko. and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 198