S.8 Evidence Act | झूठी NCR से लेकर फरार होने तक: पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति के 'आचरण' पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया विचार

Update: 2026-07-12 15:46 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने बुधवार को पत्नी की हत्या के दोषी व्यक्ति की उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी। कोर्ट ने उसके धोखेबाज़ कामों—जैसे झूठा भरोसा दिलाना, झूठी पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराना और अंत में फरार हो जाना—को भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 8 के तहत "प्रासंगिक आचरण" माना।

जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने दोषी (पवन कुमार) की जेल अपील खारिज की। उसने हरदोई सेशंस कोर्ट के 2016 के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उसे IPC की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराया गया।

मामले का संक्षिप्त विवरण

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने 6 मई 2014 को अपने ससुर (शिकायतकर्ता) को बताया कि उसकी पत्नी (पीड़िता) दो रात पहले कहीं चली गई थी और लापता है। परिवार ने उसे बहुत ढूंढा लेकिन वह नहीं मिली।

परिवार को गुमराह करने के लिए, आरोपी ने दावा किया कि उसकी पत्नी (पीड़िता) गाँव के ही एक व्यक्ति के साथ भाग गई। उनके अवैध संबंधों के शक के आधार पर आरोपी ने 17 मई 2014 को एक नॉन-कॉग्निज़ेबल रिपोर्ट (NCR) दर्ज कराई।

हालांकि, 22 मई 2014 को शिकायतकर्ता को पता चला कि आरोपी ने ही पीड़िता की हत्या की और उसके शव को स्थानीय तालाब के पास दफना दिया। जब ससुर ने उससे पूछताछ की तो आरोपी ने हत्या की बात कबूल कर ली और वह जगह भी दिखाई जहाँ उसने शव दफनाया।

इसके बाद वह तुरंत मौके से भाग गया। बाद में पुलिस ने बताई गई जगह से एक सड़ा-गला कंकाल और गाँठ लगी प्लास्टिक की रस्सी का एक टुकड़ा बरामद किया।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

चूंकि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित है, इसलिए हाईकोर्ट ने 'शरद बिरिधिचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए 'पंचशील' सिद्धांत (पाँच सुनहरे सिद्धांत) के आधार पर अभियोजन पक्ष के मामले की जांच की। बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में, हालात से जुड़े सबूतों के आधार पर घटना से पहले, घटना के समय और घटना के बाद आरोपी का व्यवहार भी अहम भूमिका निभाता है और अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि कर सकता है।

बेंच ने गौर किया कि अपराध से पहले अपराध के दौरान और अपराध के बाद आरोपी का व्यवहार एक ऐसी अटूट कड़ी बनाता है जो सीधे तौर पर उसके दोषी होने की ओर इशारा करता है।

इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 8 का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान आरोपी के पिछले या बाद के व्यवहार को तब स्वीकार्य बनाता है जब उसका मामले से जुड़े तथ्य के साथ "गहरा संबंध" हो।

स्टेट (NCT ऑफ़ दिल्ली) बनाम नवजोत संधू मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि आरोपी का व्यवहार 'खुद ही सब कुछ बयां करता है' और यह मकसद या तैयारी का सीधा नतीजा होता है।

कोर्ट ने खास तौर पर धारा 8 के उदाहरण (i) का ज़िक्र किया, जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया कि कथित अपराध करने के बाद भाग जाना, या अपराध में इस्तेमाल की गई चीज़ों को छिपाने की कोशिश करना, दोषी ठहराने के लिए बहुत अहम तथ्य हैं।

कोर्ट ने अपीलकर्ता के व्यवहार के कई खास उदाहरणों पर ज़ोर दिया, जो एविडेंस एक्ट की धारा 8 के दायरे में आते हैं; यह धारा आरोपी के पिछले या बाद के व्यवहार को तब स्वीकार्य बनाती है, जब वह मामले से जुड़े किसी तथ्य को प्रभावित करता है या उससे प्रभावित होता है।

कोर्ट ने बताया कि ये बातें उसके 'प्रासंगिक व्यवहार' को दिखाती हैं:

1. वह अपनी पत्नी से झगड़ता था और उसके कथित नाजायज रिश्तों को लेकर मन में गहरा, बेबुनियाद शक पाले हुए था।

2. लगातार परेशान किए जाने के कारण, पीड़िता अपने पिता के घर चली गई; और आरोपी ने उसे यह झूठा भरोसा और समझौता देकर वापस बुलाया कि वह उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

3. उसने अपने ससुर को यह बताने में दो दिन लगा दिए कि कुसुमा "भाग गई"। जब खोज शुरू हुई तो उसने यह दावा करके जांच को गुमराह करने की कोशिश की कि वह गांव के ही एक व्यक्ति के साथ भाग गई।

4. उसने उसके गायब होने के 13 दिन बाद एक नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट (NCR) दर्ज कराई, जिसमें उसने शक को हटाने के लिए गांव के ही उस व्यक्ति पर अपनी पत्नी के अपहरण का आरोप लगाया।

5. जब उसके ससुर को आरोपी/अपीलकर्ता द्वारा मृतका की हत्या के बारे में पता चला और उन्होंने उससे सख्ती से पूछा, तो उसने हत्या करने की बात कबूल की और शव को छिपाने की जगह दिखाई, और उसके बाद वह भाग गया।

इस प्रकार, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता का व्यवहार उसकी पत्नी की हत्या में उसकी मिलीभगत को दिखाता है और केवल अपीलकर्ता के अपराध की ओर इशारा करता है और अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करता है।

इसके अलावा, बेंच ने यह भी नोट किया कि गिरफ्तारी के बाद अपीलकर्ता पुलिस को अपने घर ले गया, जहां वह फावड़ा बरामद हुआ जिसका इस्तेमाल कब्र खोदने के लिए किया गया। कोर्ट ने पाया कि छिपे हुए हथियार की ओर इशारा करना एविडेंस एक्ट की धारा 8 के तहत 'व्यवहार' के रूप में स्वीकार्य था और इसने अभियोजन पक्ष के मामले को और मजबूत किया।

दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने यह तर्क देकर अभियोजन पक्ष की कहानी पर संदेह करने की कोशिश की कि बरामद अवशेष कंकाल बन चुके थे और दावा किया कि कोई शव केवल 3 हफ्तों में कंकाल में नहीं बदल सकता, जिससे मृतका की पहचान पर सवाल उठते हैं।

हालांकि, बेंच ने इस तर्क को खारिज कर दिया, क्योंकि उसने उत्तराखंड बनाम दर्शन सिंह 2019 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जोर दिया कि मेडिकल गवाह की राय केवल एक राय होती है और जरूरी नहीं कि वह उस विषय पर अंतिम बात हो। कोर्ट ने 'मोदीज़ मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस' का भी ज़िक्र किया और कहा कि भारत जैसे बड़े देश में अलग-अलग इलाकों में मौसम की स्थिति इतनी अलग-अलग होती है कि यह बताना नामुमकिन है कि किसी लाश में सड़ने की प्रक्रिया कब शुरू होती है।

इस तरह बेंच ने यह नतीजा निकाला कि मज़बूत परिस्थितिजन्य सबूतों और संबंधित व्यवहार से अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह साबित हो गया है और परिस्थितियों की कड़ी पूरी और निर्णायक थी। इसलिए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी।

Case Title: Pawan Kumar vs. State of UP 2026 LiveLaw (AB) 387

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