परीक्षा में बैठने का अधिकार जीवन के अधिकार के समान: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पोर्टल की गड़बड़ी के कारण छूटी स्टूडेंट के लिए विशेष परीक्षा का आदेश दिया

Update: 2026-01-19 04:14 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परीक्षा में बैठने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार के समान है।

यह कहते हुए कि किसी स्टूडेंट का भविष्य "तकनीकी खामियों" या प्रशासनिक सुस्ती के कारण खतरे में नहीं डाला जा सकता, जस्टिस विवेक सरन की बेंच ने प्रयागराज स्थित यूनिवर्सिटी को B.Sc. की स्टूडेंट के लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने का निर्देश दिया, जिसे एडमिट कार्ड नहीं दिया गया, क्योंकि यूनिवर्सिटी पोर्टल उसके एडमिशन रिकॉर्ड को अपडेट नहीं कर पाया।

संक्षेप में मामला

राज्जू भैया यूनिवर्सिटी से जुड़े उर्मिला देवी पीजी कॉलेज, हंडिया में B.Sc. (बायोलॉजी) प्रथम वर्ष की स्टूडेंट श्रेया पांडे ने एक रिट याचिका दायर की थी।

उसका कहना था कि उसने 16 जुलाई, 2025 को अपनी फीस जमा कर दी थी और शैक्षणिक सत्र 2025-2026 के लिए कक्षाओं में भाग लिया। हालांकि, जब परीक्षा कार्यक्रम प्रकाशित हुआ तोउसे एडमिट कार्ड जारी नहीं किया गया।

असल में, समस्या यह थी कि उसके रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी के "समर्थ पोर्टल" पर तय तारीख तक अपडेट नहीं हो पाए। हालांकि उसका कैंडिडेट/आवेदन पोर्टल पर ड्राफ्ट के रूप में उपलब्ध था।

गलती को देखते हुए कॉलेज ने यूनिवर्सिटी को रिप्रेजेंटेशन दिया, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता सहित लगभग 30 स्टूडेंट के रिकॉर्ड अपडेट नहीं हुए हैं। हालांकि बाद में 25 स्टूडेंट के रिकॉर्ड अपडेट कर दिए गए, लेकिन याचिकाकर्ता का रिकॉर्ड फिर से अपडेट नहीं हुआ।

इसलिए केवल 'समर्थ पोर्टल' पर रिकॉर्ड अपडेट न होने के कारण याचिकाकर्ता को परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया, क्योंकि यूनिवर्सिटी उसे एडमिट कार्ड जारी नहीं कर पाई।

हाईकोर्ट का आदेश

जस्टिस सरन ने यूनिवर्सिटी के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि उन्होंने पाया कि अधिकारियों को रिकॉर्ड अपडेट न होने की पूरी जानकारी थी और डेटा ड्राफ्ट के रूप में मौजूद था। इसके बावजूद उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

बेंच ने यह भी बताया कि यूनिवर्सिटी के वकील कोर्ट को यह बताने में विफल रहे कि जब ऐसी तकनीकी त्रुटियां उनके संज्ञान में आती हैं तो वे किस मानक प्रक्रिया का पालन करते हैं। इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने राहुल पांडे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 2025 मामले में अपने हाईकोर्ट के हालिया आदेश पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि "संबंधित परीक्षा में शामिल होना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है"।

कोर्ट ने Re: मास्टर प्रभनूर सिंह विर्दी (नाबालिग बेटा) बनाम इंडियन स्कूल और अन्य, 2023 के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें भी ऐसा ही रुख अपनाया गया कि स्टूडेंट को परीक्षा देने की अनुमति न देना, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन के अधिकार के समान बच्चे के अधिकार का उल्लंघन होगा।

इस प्रकार, यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता की कोई गलती नहीं थी और "केवल तकनीकी कमियों" के कारण उसके भविष्य को खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए, हाईकोर्ट ने अनिवार्य अंतरिम निर्देश जारी किया।

जस्टिस सरन ने आदेश दिया,

"यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया जाता है कि वह आज से दो सप्ताह के भीतर शैक्षणिक सत्र 2025-2026 के लिए याचिकाकर्ता की B.Sc. (बायोलॉजी) पहले सेमेस्टर की परीक्षा आयोजित करे और आगे निर्देश दिया जाता है कि परिणाम उचित समय के भीतर प्रकाशित किया जाए ताकि याचिकाकर्ता अपनी आगे की पढ़ाई जारी रख सके।"

कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के रिकॉर्ड को उचित समय के भीतर अपडेट करने के लिए सभी उचित कदम उठाए जाएं ताकि उसका 'भविष्य' सुरक्षित हो सके।

इस बीच, प्रतिवादी यूनिवर्सिटी के वकील से काउंटर-एफिडेविट दाखिल करने के लिए कहा गया, जिसमें यूनिवर्सिटी द्वारा वेब पोर्टल को अपडेट करने में असमर्थता की जानकारी मिलने पर अपनाई गई प्रक्रिया को रिकॉर्ड पर लाया जाए।

मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को होगी।

Case title - Shreya Pandey vs. State Of U.P. And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 26

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