इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह रुदौली (अयोध्या) तहसील के राजस्व मामले में बार-बार स्थगन पर गहरी चिंता व्यक्त की, जहां 102 सुनवाइयों में से 68 स्थानीय बार एसोसिएशन की हड़ताल या शोक संवेदना के कारण स्थगित कर दी गईं।

जस्टिस आलोक माथुर की पीठ ने रुदौली बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महासचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर नियमित आधार पर बहिष्कार के आह्वान के बारे में स्पष्टीकरण देने और यह बताने का निर्देश दिया कि उनके आचरण के प्रत्यक्ष परिणाम स्वरूप "ऐसी दयनीय स्थिति पैदा करने" के लिए उनके विरुद्ध उचित कार्रवाई क्यों न की जाए।

संक्षेप में मामला

न्यायालय मोहम्मद नजीम खान द्वारा अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने उप्र राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत एसडीएम के समक्ष लंबित एक मामले में शीघ्र सुनवाई के निर्देश देने का अनुरोध किया था।

याचिका के साथ दायर आदेश पत्र से पता चला कि मामले में तय की गई 102 तारीखों में से 68 तारीखों को स्थानीय बार एसोसिएशन द्वारा बहिष्कार या शोक व्यक्त करने के आह्वान के कारण मामले की सुनवाई स्थगित कर दी गई।

इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पीठ ने कहा कि 27 मई, 2025 से पिछले 21 तारीखों में से प्रत्येक तारीख को स्थानीय बार एसोसिएशन द्वारा बहिष्कार के आह्वान के कारण मामले की सुनवाई स्थगित कर दी गई।

यह मानते हुए कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, पीठ ने उन गरीब वादियों की दुर्दशा पर भी ध्यान दिया, जिन्हें राजस्व न्यायालय में कार्यवाही अंतहीन रूप से लंबित रहने के कारण हाईकोर्ट का रुख करना पड़ता है।

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि हड़तालों के कारण राजस्व न्यायालयों में कार्यवाही ठप हो रही है, पीठ ने रेखांकित किया कि ऐसा आचरण सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों का घोर उल्लंघन है, जिनमें पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ (2002), हुसैन बनाम भारत संघ (2017) और जिला बार एसोसिएशन, देहरादून बनाम ईश्वर शांडिल्य (2020) शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया:

"वकीलों को हड़ताल पर जाने या बहिष्कार का आह्वान करने का कोई अधिकार नहीं है, यहां तक कि सांकेतिक हड़ताल पर भी नहीं... कोई भी बार काउंसिल या बार एसोसिएशन हड़ताल या बहिष्कार के आह्वान पर विचार करने के लिए बैठक बुलाने की अनुमति नहीं दे सकता।"

इस प्रकार, मामले को गंभीरता से लेते हुए न्यायालय ने रुदौली बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महासचिव को प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया और उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि उनके खिलाफ उचित कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

न्यायालय ने यह भी दर्ज किया,

"उपरोक्त वकीलों/पदाधिकारियों का व्यावसायिक कदाचार भी न्यायालय की अवमानना ​​के समान हो सकता है।"

पदाधिकारियों को 2 सितंबर, 2025 को व्यक्तिगत हलफनामों के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया, जिसमें बार-बार बहिष्कार के आह्वान की व्याख्या की गई हो।

Case title - Mohd. Najim Khan vs. The Tahsildar / Assistant Collector First Class, Pargana. Tahsil Rudauli, Ayodhya And Another

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