'बीमारी की पर्ची' विवाद में वकील को राहत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹20K का जुर्माना माफ किया, माफी के बाद प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं

Update: 2026-04-20 04:27 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते एक वकील के ख़िलाफ़ पहले की गई अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां हटा दीं। इस वकील ने उसी दिन किसी दूसरी कोर्ट में अन्य मामले में पेश होते हुए इस कोर्ट में 'बीमारी की पर्ची' भेजकर कोर्ट को धोखा देने की कोशिश की थी।

वकील द्वारा दी गई बिना शर्त मौखिक माफी स्वीकार करते हुए जस्टिस गौतम चौधरी की बेंच ने 24 मार्च, 2026 को पारित आदेश में वकील पर लगाए गए ₹20,000/- के जुर्माने को भी माफ किया।

हाईकोर्ट के 17 अप्रैल के आदेश में कहा गया,

"वर्तमान संशोधन आवेदन के समर्थन में दायर हलफनामे में दी गई लिखित बिना शर्त माफी। साथ ही वकील जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव द्वारा दी गई बिना शर्त मौखिक माफी को ध्यान में रखते हुए, 24.03.2026 के आदेश के पैरा 8 से 10 में की गई टिप्पणियों/निर्देशों को हटाया जाना उचित है।"

बता दें, अपने पिछले आदेश में बेंच ने यह टिप्पणी की थी कि अग्रिम जमानत याचिका पर बहस करने के लिए नियुक्त वकील उसी दिन किसी अन्य मामले में पेश हुए, जबकि उन्होंने इस कोर्ट में चल रहे वर्तमान मामले में 'बीमारी की पर्ची' भेजी थी।

जस्टिस चौधरी ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि वकील ने कोर्ट को इस तथ्य से अवगत नहीं कराया कि आवेदक को पहले ही किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा मिल चुकी थी।

बेंच ने टिप्पणी की थी,

"आवेदकों के वकील ने मामले की सही स्थिति से कोर्ट को अवगत कराने का कोई प्रयास नहीं किया। इसलिए यह कोर्ट इस बात को गंभीरता से लेता है। आवेदकों के वकील का आचरण यह दर्शाता है कि वे कोर्ट को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं, जो न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है—विशेष रूप से तब, जब हर दिन बड़ी संख्या में नए मामले दायर हो रहे हैं और कोर्ट पहले से ही लंबित मामलों के बोझ तले दबी हुई हैं। कोर्ट के एक अधिकारी होने के नाते वकील का यह कर्तव्य है कि वे कोर्ट को सही तथ्यों से अवगत कराकर कोर्ट का कीमती समय बचाएं। आवेदकों के वकील के इस आचरण के कारण इस वर्तमान मामले में कोर्ट का कीमती समय बर्बाद हुआ।"

यह ज़मानत याचिका ऐसे मामले से जुड़ी थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं और शिकायतकर्ताओं के बीच कई विवाद थे और कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान की थी। यह दलील दी गई कि शिकायतकर्ता ने दुर्भावना से प्रेरित होकर मजिस्ट्रेट के सामने एक और शिकायत दर्ज कराई, जिसे FIR मान लिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इन कार्यवाहियों में अग्रिम ज़मानत की मांग की।

सुनवाई के दौरान, शिकायतकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि, हालांकि याचिकाकर्ताओं के वकील ने अग्रिम ज़मानत याचिका में बीमारी की पर्ची भेजी थी, लेकिन वे दूसरी कोर्ट के सामने एक विशेष अपील में पेश हुए।

यह देखते हुए कि उसी कार्यवाही से जुड़े अन्य मामले में याचिकाकर्ताओं को गिरफ़्तारी से अंतरिम सुरक्षा पहले ही दी जा चुकी थी, कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की।

यह टिप्पणी करते हुए कि याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को धोखा देने की कोशिश की थी, उन पर ₹20,000 का जुर्माना लगाया गया।

Case Title: Arun Kumar Yadav v. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 171

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