20 साल तक बाकी रकम जमा न करने के बाद प्रॉपर्टी खरीदने वाला सेल डीड लागू करने की मांग नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी खरीदने वाला व्यक्ति 20 साल तक बिक्री की बाकी रकम जमा न करने के बाद सेल डीड को लागू करने की मांग नहीं कर सकता।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने उस खरीदार को बाकी रकम जमा करने के लिए समय देने वाला आदेश रद्द किया, जिसके पक्ष में 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का मुकदमा तय हुआ था। कोर्ट ने देखा कि उसने बकाया रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की अर्जी देने में 20 साल का इंतज़ार किया।
राम लाल बनाम जरनैल सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा,
“राम लाल (ऊपर बताया गया) मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ तौर पर वादी-प्रतिवादी के मामले को खारिज करता है, क्योंकि वादी ने तय समय के भीतर बिक्री की बाकी रकम जमा करने में जानबूझकर लापरवाही बरती और बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की दूसरी अर्जी देने में लगभग 20 साल से ज़्यादा का इंतज़ार किया।
देरी की अवधि और इस बीच बने हालात 'जजमेंट डेटर' (जिसके खिलाफ फैसला आया है) के पक्ष में हैं। 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के मुकदमे में कोर्ट को दोनों पक्षों के बीच निष्पक्षता बनाए रखनी होती है। ऊपर बताए गए फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे का फैसला एक शुरुआती डिक्री (प्रारंभिक आदेश) होती है। जिस कोर्ट ने डिक्री पास की है, उसके पास यह अधिकार है कि वह तय समय के भीतर भुगतान/जमा न करने पर कॉन्ट्रैक्ट/डिक्री को रद्द कर दे या भुगतान/जमा करने की समय-सीमा बढ़ा दे। इस मामले में वादी-प्रतिवादी की ओर से बिक्री की बाकी रकम जमा करने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने में बिना किसी ठोस कारण के देरी हुई है।"
प्रतिवादी दुलीराम मौर्य ने 1991 में कुल 25,000 रुपये में ज़मीन बेचने का समझौता किया था, जिसमें से 13,000 रुपये उसी दिन वादी नंदराम ने चुका दिए थे, जिसने प्रॉपर्टी खरीदी थी।
बाकी 12,000 रुपये सेल डीड (बिक्री विलेख) के निष्पादन के समय चुकाए जाने थे। इसके बाद नंदराम ने बिक्री समझौते के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) के लिए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 1998 में केस खारिज किया। कोर्ट ने माना कि सेल-डीड (बिक्री विलेख) को पूरा करने के लिए कोई लेन-देन नहीं हुआ और यह एग्रीमेंट असल में डिफेंडेंट द्वारा लिए गए लोन को छिपाने का एक तरीका था।
2003 में वादी की सिविल अपील मंजूर कर ली गई और केस में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने डिफेंडेंट को दो महीने के भीतर सेल एग्रीमेंट पूरा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने वादी-खरीदार को बाकी रकम जमा करने का भी निर्देश दिया।
डिफेंडेंट-विक्रेता ने दूसरी अपील दायर की, जो बिना किसी अंतरिम आदेश के हाईकोर्ट में लंबित रही। इसे सितंबर 2019 में खारिज कर दिया गया। इस बीच वादी-खरीदार ने 6 अगस्त 2012 को फैसले को लागू करवाने की कार्यवाही (एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स) शुरू की।
दूसरी अपील खारिज होने के बाद डिफेंडेंट ने स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28 के तहत एक अर्जी दी ताकि वादी द्वारा शुरू की गई एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स को रोका जा सके। वादी ने इसका विरोध किया और 17.11.2025 को बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने और देरी को माफ करने की अर्जी दी।
संदर्भ के लिए, धारा 28 विक्रेता को उसी केस में, जिसमें स्पेसिफिक परफॉर्मेंस (अनुबंध का पालन) का फैसला सुनाया गया, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने की अर्जी देने की अनुमति देती है। ऐसा तब किया जा सकता है, जब खरीदार फैसले में तय समय या कोर्ट द्वारा दी गई अतिरिक्त समय-सीमा के भीतर खरीद की रकम का भुगतान न करे।
23 दिसंबर 2025 के आदेश से एग्जीक्यूशन कोर्ट ने डिफेंडेंट की अर्जी खारिज की और 1000 रुपये के खर्च (कॉस्ट) पर बाकी रकम जमा करने के लिए समय बढ़ाने की वादी की अर्जी मंजूर कर ली। इसके खिलाफ डिफेंडेंट-विक्रेता ने रिवीजन याचिका दायर की जिसे खारिज कर दिया गया; इस खारिज आदेश के खिलाफ डिफेंडेंट हाईकोर्ट गया।
डिफेंडेंट-विक्रेता के वकील ने तर्क दिया कि वादी-खरीदार ने फैसले के बाद लगभग नौ साल तक न तो पैसे जमा किए और न ही एग्जीक्यूशन के लिए कोई कदम उठाया, और उसके बाद दायर समय बढ़ाने की अर्जी भी लंबित पड़ी रही। यह कहा गया कि 20 साल से भी अधिक समय बाद जमा करने की अनुमति देना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा; चूंकि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस एक इक्विटेबल रिलीफ (न्यायसंगत राहत) है, इसलिए कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने या समय बढ़ाने का फैसला करते समय कोर्ट को इक्विटी (निष्पक्षता/न्याय) के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
वादी के वकील ने कहा कि धारा 28 के तहत डिक्री-होल्डर समय बढ़ाने की मांग भी कर सकता है। यह बताया गया कि 2012 में जब एग्जीक्यूशन (डिक्री लागू करने की प्रक्रिया) शुरू हुई, तब दी गई अर्ज़ी पेंडिंग रही और दूसरी अपील पर फ़ैसले का इंतज़ार करते हुए एग्जीक्यूशन पर ज़ोर नहीं दिया गया। यह तर्क दिया गया कि 2003 की डिक्री 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, इसलिए समय की गिनती 2003 से नहीं की जा सकती।
वादी के इस तर्क को खारिज करते हुए कि एग्जीक्यूशन लिमिटेशन एक्ट के तहत तय बारह साल की अवधि के भीतर है, कोर्ट ने कहा:
“यह तर्क पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है, क्योंकि यह 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध के पालन) का मामला है, जिसमें पहली अपीलीय अदालत ने 22.11.2003 को वादी-प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री पारित की थी और उसे बिक्री की बाकी रकम जमा करने के लिए एक महीने का समय दिया था।”
दूसरी अपील के रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया, कानून का कोई अहम सवाल तय नहीं किया गया और कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया।
“वादी-प्रतिवादी न तो दूसरी अपीलीय अदालत के सामने पेश हुआ और न ही दूसरी अपील का विरोध किया। वह बस बाहर से कार्यवाही देखता रहा।”
कोर्ट ने यह भी देखा कि 2012 की एग्जीक्यूशन कार्यवाही में समय बढ़ाने की जो अर्ज़ी दी गई, उसे न तो मंज़ूरी मिली और न ही उस पर ज़ोर दिया गया और दूसरी अर्ज़ी 2025 में आई, यानी दूसरी अपील खारिज होने के छह साल बाद। कोर्ट ने माना कि इससे पता चलता है कि वादी न तो डिक्री को लागू करवाने में दिलचस्पी रखता था और न ही सौदे के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार था।
मर्जर (डिक्री के विलय) के मुद्दे पर हालांकि कोर्ट ने माना कि 2003 की डिक्री 23 सितंबर 2019 के दूसरे अपीलीय फ़ैसले में मिल गई, लेकिन यह भी कहा कि इससे वादी को कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि उस तारीख से भी गिनती करने पर समय बढ़ाने की दूसरी अर्ज़ी 17 नवंबर 2025 को आई, जबकि पहली अर्ज़ी पर कभी ज़ोर नहीं दिया गया।
कोर्ट ने आगे कहा,
“निचली दोनों अदालतें इस मामले में निष्पक्षता बनाए रखने में नाकाम रहीं और उन्होंने गलत तरीके से यह दर्ज किया कि दूसरी अपील पेंडिंग होने के कारण डिक्री को लागू करवाने में वादी-प्रतिवादी की कोई गलती नहीं थी।”
कोर्ट ने विक्रेता की अर्ज़ी मंज़ूर करते हुए उसे निर्देश दिया कि वह 3.7.1991 के बिक्री समझौते के तहत खरीदार से मिली अग्रिम राशि को उसे प्राप्त होने की तारीख से 6% ब्याज के साथ एक महीने के भीतर जमा करे।
Case Title: Duliram Maurya v. Nandram