इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते राज्य सरकार को एक व्यक्ति को ₹50,000 का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। इस व्यक्ति को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले 15 अगस्त से 19 अगस्त, 2026 तक गैर-कानूनी रूप से पुलिस हिरासत में रखा गया।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कमलेश कुमार की 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर यह आदेश दिया। कुमार ने आरोप लगाया कि 15 अगस्त को दो हथियारबंद पुलिसकर्मियों ने उन्हें उनकी मेडिकल शॉप से ​​गैर-कानूनी तरीके से उठाया था।

संक्षेप में मामला

कुमार को उनके पड़ोसी के इस आरोप की पुलिस जांच के बाद हिरासत में लिया गया कि वह बांग्लादेशी नागरिक हैं। प्रयागराज कमिश्नरेट के असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (इंटेलिजेंस) की जांच में आरोप लगाया गया कि कुमार बांग्लादेश के रहने वाले हैं और पश्चिम बंगाल में उनका एक अस्थायी पता है।

जांच रिपोर्ट 27 जून, 2026 की थी। इसके बाद कुमार के खिलाफ BNS की धाराओं 318(4), 336(3), 338, 340(2) और 351(3); इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धाराओं 21 और 22; और पासपोर्ट एक्ट, 1967 की धारा 12 के तहत FIR दर्ज की गई।

कुमार को 15 अगस्त को प्रयागराज के सोनार तारा इलाके में उनकी मेडिकल शॉप से ​​मेजा पुलिस ने उठाया और 19 अगस्त को जेल भेजा था। इसलिए उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

शुरुआत में ही, हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि वह कुमार की नागरिकता से जुड़े आरोपों के गुण-दोष की जांच नहीं कर रहा है और खुद को केवल 15 अगस्त से उनकी कथित गैर-कानूनी हिरासत के सवाल तक सीमित रख रहा है।

हाईकोर्ट को बताया गया कि पुलिस ने जांच की, जिसमें पाया गया कि संबंधित SHO और IO 15 अगस्त को याचिकाकर्ता की हिरासत के बारे में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे। इसलिए उन्हें "घोर लापरवाही" के लिए सस्पेंड कर दिया गया। SHO ने अपने हलफ़नामे में कहा कि उन्होंने दो कॉन्स्टेबलों को निर्देश दिया कि वे कुमार से पुलिस स्टेशन आकर रिपोर्ट करने को कहें, लेकिन उन्होंने "संदेश को गलत समझा" और इसके बजाय उसे अपने साथ चलने को कहा।

उन्होंने आगे बताया कि 15 अगस्त को इलाके में गोलीबारी की घटना की सूचना मिलने के बाद वे घायलों की देखभाल के लिए SRN अस्पताल, प्रयागराज गए और 16 अगस्त की सुबह तक वहीं रहे। इस बीच, कुमार के खिलाफ FIR 16 अगस्त को दर्ज की गई।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि कुमार को केवल 19 अगस्त को गिरफ्तार दिखाया गया, जबकि पुलिस जांच से साफ पता चलता था कि वह 15 अगस्त से ही पुलिस हिरासत में था।

इन दलीलों पर विचार करते हुए बेंच ने यह टिप्पणी की:

"पुलिस ने साफ तौर पर माना कि याचिकाकर्ता को 24 घंटे से ज़्यादा समय तक गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया।"

इसके बाद बेंच ने यह फैसला सुनाया:

"यह कोर्ट बिना किसी हिचकिचाहट के यह मानती है कि याचिकाकर्ता को 15.08.2026 से लेकर तब तक गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया, जब तक कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और 19.08.2026 को न्यायिक रिमांड पर नहीं भेजा गया।"

इसे देखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश राज्य को कानून के अनुसार उसे गिरफ्तार करने से नहीं रोकेगा, अगर बाद में लंबित आपराधिक मामले में उसकी हिरासत की आवश्यकता होती है।

बेंच ने राज्य को गैर-कानूनी हिरासत के लिए ₹50,000 का मुआवज़ा देने का भी निर्देश दिया। यह रकम उन लोगों से वसूली जाएगी जो उचित जांच के बाद इसके लिए ज़िम्मेदार पाए जाएंगे।

मुआवज़ा तुरंत देने का निर्देश दिया गया, जबकि वसूली की प्रक्रिया अनुशासनात्मक जांच के बाद तीन महीने के भीतर पूरी की जानी थी।

हालांकि, मामले को समाप्त करने से पहले, कोर्ट ने DCP विवेक चंद्र यादव की तारीफ़ की। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अपने हलफ़नामे में बिना किसी घुमाव-फिराव के साफ़ तौर पर अपनी गलती बताई और बिना किसी संदेह के पुलिस की चूक को स्वीकार किया।

बेंच ने निर्देश दिया कि DCP के इस व्यवहार के लिए उनकी तारीफ़ को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। कोर्ट ने SHO की भी तारीफ़ की कि उन्होंने "सही जानकारी दी" और अपनी गलती मानी।

कोर्ट ने कहा कि सावधानी न बरतने के कारण एक व्यक्ति को कानून द्वारा तय प्रक्रिया के सुरक्षा-कवच के बिना पांच दिनों तक जेल में रहना पड़ा।

साथ ही कोर्ट ने यह भी पाया कि इस मामले में कोई दुर्भावना नहीं थी। बेंच ने इस घटनाक्रम को "दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की एक श्रृंखला" बताया। बेंच ने उम्मीद जताई कि पुलिस भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुधारात्मक कदम उठाएगी और साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगी कि जांच की ज़रूरतों और आरोपी व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों, दोनों का ध्यान रखा जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील सत्यम श्रीवास्तव पेश हुए।

Case Title - Kamlesh Kumar (Corpus) And Another vs. State Of U.P. And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 735

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