PC Act | आरोप तय करने के चरण में अपराध साबित होना ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ मज़बूत शक काफ़ी: हाईकोर्ट का पूर्व GST अधिकारी को राहत देने से इनकार
भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व GST अधिकारी को राहत देने से इनकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि आरोप तय करने के चरण में कोर्ट का ध्यान केवल इस बात पर होता है कि क्या आरोपी के खिलाफ़ अपराध करने का "मज़बूत शक" है; इस चरण में अपराध साबित होने की अंतिम कसौटी लागू नहीं होती।
जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने कहा,
"...आरोपी/रिविज़न याचिकाकर्ता को आरोपमुक्त करने के सवाल पर विचार करते समय कोर्ट जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री की विस्तृत छानबीन नहीं करता है। अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर पेश की गई सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ़ गंभीर संदेह होने पर वैध रूप से आरोप तय किए जा सकते हैं।"
इसके साथ ही कोर्ट ने धनेंद्र कुमार पांडे की याचिका खारिज की। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें CrPC की धारा 227 के तहत उनकी आरोपमुक्ति की याचिका खारिज कर दी गई और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित) की धारा 7 के तहत आरोप तय किए गए।
मामले का संक्षिप्त विवरण
अभियोजन पक्ष के अनुसार, रिविज़न याचिकाकर्ता लखनऊ में कमर्शियल टैक्स/GST विभाग में डिप्टी कमिश्नर के पद पर तैनात थे। उसने कथित तौर पर एक निजी कंपनी के अकाउंटेंट से कंपनी के लगभग ₹19.47 लाख के GST रिफंड दावों को मंज़ूरी देने के लिए ₹2 लाख की मांग की थी।
विजिलेंस एस्टेब्लिशमेंट में शिकायत दर्ज होने के बाद ट्रैप (रंगे हाथों पकड़ने की कार्रवाई) से पहले जांच की गई और उसके बाद ट्रैप की कार्रवाई की गई।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि 19 मार्च, 2024 को ट्रैप की कार्रवाई के दौरान, आरोपी को अपनी मेज़ की दराज में रिश्वत के नोट रखते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया।
कथित रिश्वत के नोट पहले से रिकॉर्ड किए गए सीरियल नंबरों से मेल खाते थे और ट्रैप प्रक्रिया के हिस्से के रूप में फेनोल्फथलीन टेस्ट किया गया।
इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।
पेश की गई दलीलें
रिविज़न याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1988 के अधिनियम की धारा 7 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है, क्योंकि अभियोजन पक्ष अवैध रिश्वत की मांग के मुख्य तत्व को साबित करने में विफल रहा है। यह तर्क दिया गया कि कथित मांग से पहले ही कमियों के कारण रिफंड के दावे खारिज कर दिए गए, इसलिए आरोपी के पास कोई लंबित काम नहीं बचा था और रिश्वत मांगने का कोई कारण नहीं था।
याचिकाकर्ता ने ट्रैप टीम के गठन और असल ट्रैप के बीच हुई देरी पर भी सवाल उठाए। यह तर्क दिया गया कि स्वतंत्र गवाहों ने मांग के बारे में कथित बातचीत नहीं सुनी थी। उनका यह भी कहना था कि अभियोजन की मंजूरी बिना ठीक से सोचे-समझे दी गई।
दूसरी ओर, राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि आरोपी को शिकायतकर्ता से ₹2 लाख लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया और ऐसे पर्याप्त सबूत थे जो अवैध रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने, दोनों को साबित करते थे।
यह बताया गया कि ट्रैप से पहले विस्तृत जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई और 1988 के अधिनियम की धारा 7 की शर्तें पूरी होती थीं।
हाईकोर्ट का आदेश और टिप्पणियां
हाईकोर्ट को आरोपी को आरोपमुक्त करने से इनकार करने के स्पेशल जज के फैसले में कोई कमी नहीं मिली।
अदालत ने गौर किया कि स्वतंत्र गवाह ट्रैप से पहले की कार्यवाही में शामिल थे, ट्रैप टीम के साथ गए और जांच के दौरान उन्होंने बताया कि आरोपी को उनकी मौजूदगी में रिश्वत के पैसे दराज में रखते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया।
इन हालात में कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच हुई बातचीत नहीं सुनी, यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने घटना नहीं देखी थी।
बेंच ने कहा,
"...क्योंकि रिश्वत के पैसों के लेन-देन की बातचीत आरोपी (रिविजनिस्ट) के कमरे में उसके और शिकायतकर्ता के बीच हुई। ट्रैप टीम के सदस्यों के लिए उनकी बातचीत सुनना मुमकिन नहीं था, क्योंकि वे कमरे के बाहर अलग-अलग जगहों पर खड़े थे या छिपे हुए थे।"
सुप्रीम कोर्ट के 'वी. कन्नन बनाम राज्य (2009)' मामले के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन पक्ष को गैर-कानूनी लाभ (रिश्वत) की मांग और उसे स्वीकार करने, दोनों को साबित करना होगा।
इसने 'नीरज दत्ता बनाम राज्य (दिल्ली सरकार) 2022' मामले में संविधान पीठ के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि 1988 के एक्ट की धारा 7 और 13 के तहत मांग और स्वीकृति का सबूत होना ज़रूरी है। साथ ही यह भी साफ़ किया गया कि अगर शिकायतकर्ता का सीधा सबूत न हो तो भी सही मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए दूसरे सबूतों के आधार पर अपराध का अनुमान लगाया जा सकता है।
इन फ़ैसलों के आधार पर कोर्ट ने पाया कि ट्रैप, पैसे की बरामदगी, केमिकल टेस्ट और मटीरियल सबूतों से जुड़ी फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट के आधार पर अभियोजन पक्ष का मामला प्रथम दृष्टया (prima facie) साबित हो रहा था; ये सबूत रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने के अभियोजन पक्ष के दावे का समर्थन करते थे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप तय करने या डिस्चार्ज (आरोप से बरी करने) के सवाल पर विचार करते समय जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों की बहुत बारीकी से जांच करने की ज़रूरत नहीं होती।
कोर्ट ने आगे कहा कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से पैदा हुए गंभीर संदेह के आधार पर भी सही तरीके से आरोप तय किए जा सकते हैं।
'अमित कपूर बनाम रमेश चंदर 2012' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि हाईकोर्ट को इस बात पर विचार करते समय कि क्या आरोप रद्द किए जाने चाहिए या किसी आरोपी को डिस्चार्ज किया जाना चाहिए, सबूतों की बहुत बारीकी से जांच नहीं करनी चाहिए।
इन हालात को देखते हुए रिविजन याचिका में कोई दम न पाते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज की और पूर्व GST अधिकारी के डिस्चार्ज की अर्जी खारिज करने और उन पर आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
Case Title - Dhanendra Kumar Pandey vs. State of U.P. & Another 2026 LiveLaw (AB) 539
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