CJP सदस्य ने 'जर्जर' सरकारी स्कूल का वीडियो दिखाने पर UP Police की FIR के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया
'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के सदस्य और छात्र ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग की। यह FIR फर्रुखाबाद के सरकारी प्राइमरी स्कूल की हालत दिखाने वाला वीडियो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर शेयर करने के आरोप में दर्ज की गई।
गौरव भारती उर्फ गौरव कुमार द्वारा दायर याचिका में 19 अगस्त को BNS की धारा 352 और 353 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 के तहत दर्ज FIR को चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी और उसके बाद होने वाली आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा की भी मांग की। उनका तर्क है कि अगर FIR के आरोपों को सही भी मान लिया जाए तो भी इसमें उन अपराधों के ज़रूरी तत्व नहीं दिखते जिनके तहत मामला दर्ज किया गया।
यह याचिका वकील शाश्वत आनंद, रत्ना सिंह और सौमित्र आनंद के माध्यम से दायर की गई है। मामले की सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है।
याचिका के बारे में
याचिका के अनुसार, विवाद 16 अगस्त, 2026 को शुरू हुआ, जब याचिकाकर्ता कथित तौर पर फर्रुखाबाद के करणपुर माजरा बसमल स्थित एक सरकारी प्राइमरी स्कूल के परिसर में गया और स्कूल की हालत का वीडियो रिकॉर्ड किया।
याचिका में कहा गया कि उस दिन स्कूल बंद था और वीडियो में "इस्तेमाल न होने वाली/जर्जर" इमारत दिखाई गई, जिसमें इस्तेमाल में बताई जा रही एक संरचना पर क्रॉस का निशान दिखाया गया।
इसमें आगे कहा गया कि याचिकाकर्ता ने वीडियो में बताया कि स्कूल में पानी भर गया, जिससे बच्चों के बैठने की जगह नहीं बची और उन्हें छुट्टी देनी पड़ी।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह वीडियो एक सार्वजनिक शिक्षण संस्थान की हालत और बच्चों की भलाई व सुविधाओं से जुड़े मामलों को उजागर करने के लिए "अच्छी नीयत" से बनाया और पब्लिश किया गया। हालांकि, उनके खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई।
याचिका में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया पर याचिकाकर्ता की अच्छी-खासी मौजूदगी है; उनके इंस्टाग्राम पर लगभग 2.5 लाख और फेसबुक पर 1.5 लाख फॉलोअर्स हैं।
FIR में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता एक अज्ञात व्यक्ति के साथ स्कूल गया, जो कथित तौर पर शराब के नशे में था और उसने शिक्षकों से "बेमतलब की बातें" कीं। इसके बाद 19 अगस्त को शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई।
हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क है कि FIR में कथित तौर पर कहे गए असल शब्द नहीं लिखे गए, यह नहीं बताया गया कि ये शब्द किसके लिए कहे गए, और न ही यह समझाया गया है कि इनसे जान-बूझकर अपमान कैसे हुआ।
साथ ही इसमें याचिकाकर्ता पर मारपीट, आपराधिक बल प्रयोग, धमकी, बाधा डालने या हिंसा का कोई अन्य कृत्य करने का आरोप भी नहीं लगाया गया।
याचिका में IT Act की धारा 66 लागू करने को साफ तौर पर चुनौती दी गई। इसमें कहा गया कि FIR में कंप्यूटर डेटा तक अनधिकृत पहुंच, उसकी कॉपी या उसे निकालने, कंप्यूटर में कोई हानिकारक चीज़ (कंटैमिनेंट) डालने, कंप्यूटर सिस्टम को नुकसान पहुंचाने या उसमें रुकावट डालने, कंप्यूटर की जानकारी मिटाने या बदलने, या IT Act की धारा 43 के तहत आने वाले किसी अन्य कृत्य का कोई आरोप नहीं है।
याचिका में धारा 66 के इस्तेमाल को "साफ़ तौर पर गलत" बताया गया और कहा गया कि सिर्फ़ स्कूल की बिल्डिंग का वीडियो बनाना और उसे सोशल मीडिया पर शेयर करना, अपने आप में कंप्यूटर से जुड़ा अपराध नहीं है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि आरोप BNS की धारा 353 की शर्तों को पूरा नहीं करते, जो सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयानों से संबंधित है।
इसमें बताया गया कि FIR में यह आरोप नहीं लगाया गया कि वीडियो का मकसद या उससे सशस्त्र बलों के सदस्यों में डर या घबराहट पैदा होने की संभावना थी, या किसी वर्ग या समुदाय को दूसरे वर्ग या समुदाय के खिलाफ अपराध करने के लिए उकसाने या समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का इरादा था।
याचिका के अनुसार, एकमात्र कथित नतीजा यह है कि "उस स्कूल की छवि खराब हुई"। याचिकाकर्ता का तर्क है कि प्रतिष्ठा को पहुंची ऐसी कथित क्षति, अपने आप में BNS की धारा 353 के तहत कानूनी रूप से मानी जाने वाली कार्रवाई का आधार नहीं बनती है।
इसी तरह BNS की धारा 352 के संबंध में याचिका में तर्क दिया गया कि FIR में केवल "बेतुकी बातें" (अनर्गल बातें) वाक्यांश का इस्तेमाल किया गया, बिना उन असल शब्दों को बताए, जो कथित तौर पर कहे गए या बिना यह साबित किए कि ऐसा इरादा या जानकारी थी कि ऐसे शब्द किसी व्यक्ति को सार्वजनिक शांति भंग करने या अपराध करने के लिए उकसाएंगे।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सरकारी प्राथमिक स्कूल की स्थिति के बारे में अपनी बात रिकॉर्ड करना और बताना जनहित का एक जायज़ मामला है।
याचिका में कहा गया, "अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार" में जनहित के जायज़ मामलों से संबंधित विचारों और जानकारी को साझा करने का अधिकार शामिल है, जो कानूनी प्रतिबंधों के अधीन है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता का तर्क है कि FIR को जारी रखना, जबकि अपराध के ज़रूरी तत्व कथित तौर पर मौजूद नहीं हैं, "कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग" होगा।
याचिका में FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द करने के साथ-साथ कार्यवाही के दौरान सुरक्षा की मांग की गई।