पति के कर्ज के लिए विधवा की एफडी से 19.90 लाख काटना गलत, SBI को रकम लौटाने और 1 लाख मुआवजे का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को विधवा की फिक्स्ड डिपॉजिट से उसके दिवंगत पति के व्यक्तिगत कर्ज की वसूली के लिए काटी गई 19,90,693 रुपये की रकम वापस करने का आदेश दिया। कोर्ट ने बैंक को इस कार्रवाई के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि बैंक के पास पत्नी की एफडी से उसके पति का कर्ज सीधे वसूलने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
कोर्ट ने बैंक की कार्रवाई के तरीके पर भी कड़ी टिप्पणी की।
खंडपीठ ने कहा कि विधवा की एफडी को एक शाखा से दूसरी शाखा में स्थानांतरित करना, वहां से रकम काटकर पति के कर्ज में समायोजित करना और फिर खाते को वापस पुरानी शाखा में भेजना प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की बू देता है। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को बैंकिंग प्रथा के लिए बेहद अनुचित बताते हुए कहा कि SBI की कार्रवाई को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति लखनऊ के एक अस्पताल में असिस्टेंट प्रोफेसर थे। उन्होंने 3 नवंबर 2020 को SBI से 15 लाख रुपये का व्यक्तिगत कर्ज लिया। याचिकाकर्ता पत्नी न तो इस कर्ज की सह-आवेदक थीं और न ही सह-ऋणी, गारंटर, जमानतदार, क्षतिपूर्तिकर्ता या नामिनी के रूप में उनकी कोई भूमिका थी। पति की 6 मई 2021 को कोविड-19 से मृत्यु हो गई।
इसके बाद बैंक ने पति के कर्ज की वसूली के लिए पत्नी पर भुगतान का दबाव बनाना शुरू किया। 23 सितंबर 2025 को उन्हें कानूनी नोटिस भेजकर 13,87,382 रुपये के बकाया कर्ज और ब्याज की मांग की गई तथा भुगतान नहीं करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इससे पहले 12 सितंबर 2025 को बैंक ने विधवा का वेतन खाता भी रोक दिया। RBI लोकपाल के हस्तक्षेप के बाद यह रोक हटाई गई।
इसी दौरान दोनों पक्षों के बीच कर्ज को लेकर बातचीत चल रही थी। आरोप है कि इसी बीच SBI ने याचिकाकर्ता की एफडी को भुना लिया और उसके खाते से 19,90,693 रुपये काट लिए। यह एफडी याचिकाकर्ता ने वर्ष 2025 में SBI की आशियाना शाखा में खोली थी। बाद में इसे उस जंकिपुरम शाखा में स्थानांतरित किया गया, जहां से उनके पति ने व्यक्तिगत कर्ज लिया था। खाता स्थानांतरित होते ही एफडी की रकम काटकर दिवंगत पति के कर्ज के खाते में जमा की गई। इसके बाद खाता फिर आशियाना शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक के वकील भी ऐसी किसी कानूनी व्यवस्था का हवाला नहीं दे सके, जिसके तहत पति से वसूल की जाने वाली रकम उसकी पत्नी की एफडी से सीधे काटी जा सकती हो। कोर्ट ने कहा कि बैंक ने परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए याचिकाकर्ता का अकाउंट डेबिट किया, जबकि बैंक केवल उसके अकाउंट में रखी रकम का संरक्षक था और उस रकम को उसके हित में विश्वास के आधार पर रखता था। पीठ ने इसे बैंक पर जताए गए भरोसे का गंभीर उल्लंघन माना।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SBI को मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने और व्यक्तिगत कर्ज की बकाया रकम वसूलने का अधिकार हो सकता है। लेकिन ऐसी वसूली भारत में स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है। बैंक मनमाने, मनमौजी या बिना कानूनी प्रक्रिया के तरीके से रकम नहीं काट सकता।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के राधेश्याम गुप्ता बनाम पंजाब नेशनल बैंक मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें पेंशन, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि जैसे रिटायरमेंट लाभों की प्रकृति और उनकी कुर्की से संबंधित कानूनी स्थिति पर विचार किया गया।
बैंक की कार्रवाई को निंदनीय बताते हुए हाईकोर्ट ने SBI को निर्देश दिया कि वह विधवा के खाते से काटी गई पूरी 19,90,693 रुपये की रकम तत्काल वापस करे। इस रकम पर वह ब्याज भी देना होगा, जो याचिकाकर्ता की एफडी पर लागू था। रकम चार सप्ताह के भीतर लौटाने का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने यह भी माना कि बैंक की कार्रवाई के लिए दंडात्मक और उदाहरणात्मक मुआवजा दिया जाना उचित है। याचिकाकर्ता ने मानसिक पीड़ा, भावनात्मक आघात और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग की, लेकिन पीठ ने परिस्थितियों को देखते हुए एक लाख रुपये का मुआवजा उचित माना। SBI को यह रकम भी चार सप्ताह के भीतर देने का निर्देश दिया गया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की।