'आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाता है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'कुरान का अपमान' करने के आरोपी एडिटर को राहत देने से किया इनकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते किताब के संपादक द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) खारिज की। इस याचिका में संपादक ने इस्लाम और कुरान के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक शब्द प्रकाशित करने के एक मामले में खुद को आरोपमुक्त करने की मांग की थी।
यह देखते हुए कि आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला ही देखा जाता है, जस्टिस सुभाष चंद्र शर्मा की पीठ ने ट्रायल कोर्ट का उस आदेश बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्ता-डॉ. मदन गोपाल सिन्हा (जो विचाराधीन किताब के नामित संपादक हैं) को आरोपमुक्त करने से इनकार कर दिया गया।
संक्षेप में मामला
गाजीपुर जिले के एक पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 153B और 295A के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया। आरोप यह था कि 'टंकार सावधान आगे यहाँ विस्फोटक' नाम की एक किताब प्रकाशित की गई, जिसमें इस्लाम धर्म के खिलाफ अपमानजनक शब्द थे।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि इस प्रकाशन को समाज में धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने के इरादे से प्रसारित किया गया।
पुलिस ने कई किताबें बरामद कीं और यह पाया गया कि वर्तमान याचिकाकर्ता उन किताबों का संपादक था। कहा गया कि ये किताबें आरोपी 'याशु जी महाराज' के कहने पर 'संजय पुस्तक भंडार' नामक प्रकाशन से छापी गईं।
जून, 2025 में गाजीपुर के एडिशनल सिविल जज और न्यायिक मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता द्वारा CrPC की धारा 239 के तहत दायर आरोपमुक्ति की याचिका खारिज की थी।
हाईकोर्ट के समक्ष उनके वकील ने तर्क दिया कि जांच अधिकारी ने कोई उचित जांच नहीं की और याचिकाकर्ता को केवल इसलिए झूठा फंसाया गया, क्योंकि किताब के संपादक के रूप में उसका नाम छपा हुआ था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि छपी हुई सामग्री में कुरान के संबंध में अपमानजनक बयान थे और यह सामग्री किसी विशेष वर्ग की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली थी।
केस डायरी और ट्रायल कोर्ट के आदेश की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का नाम संपादक के रूप में छपी हुई किताबों की बरामदगी से संबंधित तथ्य केस डायरी में स्पष्ट रूप से उल्लिखित था।
पीठ ने याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की,
"प्रथम दृष्टया मामला स्थापित पाया गया, जिसके परिणामस्वरूप पुनरीक्षणकर्ता द्वारा दायर की गई दोषमुक्ति की अर्जी को दिनांक 10.06.2025 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया। ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश में कोई अवैधता या अनुचितता प्रतीत नहीं होती है, किंतु यह पुनरीक्षण याचिका गुण-दोष रहित होने के कारण खारिज की जाती है।"
Case title - Madan Gopal Sinha vs State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 196