नोएडा टेक्नीशियन की मौत का मामला: गिरफ्तारी में नियमों की अनदेखी, इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विज़टाउन प्लानर्स के निदेशक की तत्काल रिहाई का आदेश
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने गुरुवार को नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत से जुड़े मामले में बड़ा आदेश देते हुए एमज़ेड विज़टाउन प्लानर्स के निदेशक अभय कुमार को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि अभय कुमार की गिरफ्तारी हाईकोर्ट के हालिया फैसले और निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए की गई।
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने पाया कि अभय कुमार की गिरफ्तारी उमंग रस्तोगी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए निर्णय के विपरीत की गई। विशेष रूप से गिरफ्तारी मेमो की धारा 13 का पालन नहीं किया गया, जो उत्तर प्रदेश में अनिवार्य रूप से लागू है।
कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो की धारा 13 के तहत पुलिस को यह स्पष्ट रूप से दर्ज करना आवश्यक होता है कि आरोपी की भूमिका से संबंधित ठोस सामग्री क्या है, साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारी की आवश्यकता क्यों पड़ी और कौन से दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद हैं। इन अनिवार्य शर्तों का पालन किए बिना की गई गिरफ्तारी को कोर्ट ने कानून के विरुद्ध माना।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए खंडपीठ ने संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अभय कुमार को तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार कर लिया गया।
मामला नोएडा के सेक्टर-150 स्थित एक व्यावसायिक निर्माण स्थल से जुड़ा है, जहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की एक पानी से भरे गड्ढे में गिरने से मौत हो गई। बताया गया कि घने कोहरे के बीच युवराज ने एक तीखा मोड़ लिया और निर्माण स्थल के पास बने खुले व पानी से भरे गड्ढे में गिर गए।
प्रारंभिक जांच में सामने आया था कि निर्माणाधीन परियोजना के पास मौजूद इस गड्ढे पर कोई चेतावनी चिह्न, बैरिकेडिंग या स्पष्ट चिन्हांकन नहीं किया गया था। यह परियोजना 'विज़टाउन प्लानर्स' द्वारा संचालित की जा रही थी।
इसी आधार पर कंपनी के निदेशक अभय कुमार को 20 जनवरी को गैर-इरादतन हत्या लापरवाही से मृत्यु कारित करने और मानव जीवन को खतरे में डालने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।
2 फरवरी को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज की, जिसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाइकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी।
हाइकोर्ट के इस आदेश को गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कानूनी रक्षा के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।