शिकायत वाले मामलों में सिर्फ़ समन जारी होने पर अग्रिम ज़मानत नहीं? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के फ़ैसले पर संदेह जताया, मामला बड़ी बेंच को सौंपा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह सवाल एक बड़ी बेंच को सौंप दिया कि क्या किसी शिकायत वाले मामले में, जिसमें कोई गैर-ज़मानती अपराध शामिल हो, आरोपी को समन जारी होने के बाद भी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी स्वीकार की जा सकती है।
जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की बेंच ने 'आशीष कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' (2025 LiveLaw (AB) 293) मामले में 2025 के एक अन्य बेंच के फ़ैसले से असहमति जताई। उस फ़ैसले में यह कहा गया कि BNSS की धारा 482 के तहत अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी सिर्फ़ समन जारी होने के आधार पर स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि बिना वारंट के पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी का कोई डर नहीं होता।
जस्टिस शुक्ला असल में अलग-अलग शिकायत वाले मामलों से जुड़ी अग्रिम ज़मानत की कई अर्जियों पर सुनवाई कर रहे थे, जब उन्होंने यह टिप्पणी की कि 'आशीष कुमार' (ऊपर उल्लिखित) मामले में दिया गया तर्क सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए क़ानून के अनुरूप नहीं है।
कोर्ट ने पाया कि पिछले फ़ैसले में उन वैधानिक प्रावधानों [CrPC की धारा 208 और 209 / BNSS की धारा 231 और 232] पर ध्यान नहीं दिया गया, जिनके तहत सेशन कोर्ट में चलने वाले अपराधों में आरोपी को हिरासत में भेजना ज़रूरी होता है।
बता दें, धारा 231 और 232 के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपराध के लिए ट्रायल का सामना करने के लिए मजिस्ट्रेट द्वारा समन किया जाता है, जिसका ट्रायल सेशन कोर्ट में होना है तो उसे हिरासत में भेजा जाना ज़रूरी है (बशर्ते ज़मानत के प्रावधान लागू हों)।
उल्लेखनीय है, 'आशीष कुमार' मामले में हाईकोर्ट ने यह तर्क दिया था कि जब कोर्ट किसी शिकायत वाले मामले में आरोपी को समन जारी करता है तो उसे गिरफ़्तारी का कोई डर नहीं रहता। इसलिए अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी स्वीकार नहीं की जा सकती।
उस मामले में सिंगल जज ने यह राय दी कि यदि समन के जवाब में कोर्ट में पेश होने पर कोर्ट द्वारा 'हिरासत' में लिया जाता है तो उसे पुलिस द्वारा की गई 'गिरफ़्तारी' के बराबर नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसे मामलों में अग्रिम ज़मानत का प्रावधान लागू नहीं होता।
अदालत ने यह टिप्पणी की,
"BNSS की धारा 482 (CrPC की धारा 438) के तहत अग्रिम ज़मानत का उद्देश्य पुलिस या किसी अन्य अभियोजन एजेंसी द्वारा बिना वारंट के की जाने वाली अवांछित और मनमानी गिरफ़्तारी से सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उस हिरासत के विरुद्ध सुरक्षा देना, जो किसी गैर-ज़मानती अपराध के आरोप में संबंधित अदालत के समक्ष पेश होने पर अदालत द्वारा ली जा सकती है।"
हालांकि, मौजूदा मामले में जस्टिस शुक्ला ने 2025 के फ़ैसले के तर्क से असहमति जताई, क्योंकि उन्होंने यह पाया कि यहां तक कि 'डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफ़ोर्समेंट बनाम दीपक महाजन 1994' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार भी, किसी व्यक्ति की 'गिरफ़्तारी' उसे 'न्यायिक हिरासत' में लेने के लिए एक पूर्व शर्त है।
हाईकोर्ट ने 'भारत चौधरी और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2003 के फ़ैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह माना गया कि अग्रिम ज़मानत पर तब रोक नहीं है, जब अदालत ने या तो शिकायत का संज्ञान ले लिया हो या जांच एजेंसी ने आरोप-पत्र (चार्जशीट) दाख़िल कर दिया हो।
कहा जा सकता है कि इस फ़ैसले का ज़िक्र हाल ही में 'सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 2026 LiveLaw (SC) 147' मामले में किया गया।
इस पृष्ठभूमि में इस बात पर ज़ोर देते हुए कि गिरफ़्तारी की आशंका को वास्तविक गिरफ़्तारी से अलग माना जाना चाहिए, अदालत ने यह राय व्यक्त की कि 'आशीष कुमार' (उपर्युक्त) मामले में निर्धारित क़ानून, 'भारत चौधरी और अन्य' (उपर्युक्त) और 'डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफ़ोर्समेंट बनाम दीपक महाजन और अन्य' (उपर्युक्त) मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित क़ानून के अनुरूप नहीं है।
उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए तथा इसमें शामिल व्यापक मुद्दे पर विचार करते हुए पीठ ने इस मामले को निम्नलिखित कानूनी प्रश्न पर विचार करने हेतु एक 'बड़ी पीठ' (Larger Bench) के पास भेज दिया:
"क्या 'आशीष कुमार' (उपर्युक्त) मामले में इस न्यायालय का वह निर्णय, जिसमें यह माना गया कि किसी शिकायत-आधारित मामले में—जिसमें किसी गैर-जमानती अपराध का आरोप हो—समन जारी होने के बाद अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) स्वीकार्य नहीं है (क्योंकि ऐसे में पुलिस द्वारा बिना वारंट के गिरफ़्तारी की कोई आशंका नहीं रहती), सही कानून प्रतिपादित करता है?"
Case title - Brajpal @ Birjju @ Bijendra and another vs State of U.P. and another along with connected cases 2026 LiveLaw (AB) 148