म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं तय होगा मालिकाना हक: इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करना नहीं है। ऐसे विवादों का समाधान केवल सिविल कोर्ट में ही किया जा सकता है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर ने यह फैसला सुनाते हुए नायब तहसीलदार के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें 34 साल बाद दायर नामांतरण निरस्तीकरण की अर्जी को खारिज कर दिया गया।
अदालत ने कहा,
“याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच का विवाद जटिल मालिकाना हक से जुड़ा है, जिसे म्यूटेशन अधिकारी तय नहीं कर सकते।”
मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि विवादित भूमि उसके पूर्वजों की भुमिधारी संपत्ति है और वह लगातार कब्जे में रहा है। उसने यह भी कहा कि वर्ष 1970 में प्रतिवादी का नाम धोखाधड़ी और गलत तथ्यों के आधार पर दर्ज कर दिया गया।
हालांकि, अदालत ने पाया कि उस समय प्रतिवादी भी जमीन पर कब्जे में था और पारिवारिक नामों में समानता के कारण म्यूटेशन के दौरान भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई होगी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में उत्तराधिकार से जुड़े जटिल प्रश्न शामिल हैं, जिन्हें म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं सुलझाया जा सकता। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में सही उपाय सिविल कोर्ट में वाद दायर कर मालिकाना हक की घोषणा कराना है।
अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता द्वारा 1970 के आदेश को चुनौती देने में अत्यधिक देरी हुई, जिससे उसकी अर्जी समय-सीमा के कारण भी स्वीकार नहीं की जा सकती।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करता है तो नायब तहसीलदार की टिप्पणियां उस पर बाध्यकारी नहीं होंगी और अदालत स्वतंत्र रूप से मामले का निर्णय करेगी।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह दोहराया कि म्यूटेशन केवल राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया है, न कि संपत्ति के अधिकार तय करने का मंच।