झूठी FIR दर्ज कराने वालों पर पुलिस के लिए मुकदमा चलाना अनिवार्य, पालन न करने पर IOs को अवमानना का सामना करना पड़ेगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य की पुलिस मशीनरी को सख्त निर्देश दिया कि वे उन व्यक्तियों/सूचना देने वालों के खिलाफ अनिवार्य रूप से मुकदमा शुरू करें, जो झूठी या दुर्भावनापूर्ण फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराते हैं।
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने कहा कि अगर जांच में पता चलता है कि FIR झूठी जानकारी पर आधारित थी तो IO "कानूनी रूप से बाध्य" है कि वह BNSS की धारा 215(1)(a) (CrPC की धारा 195(1)(a) के बराबर) के तहत सूचना देने वाले के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करे।
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर पुलिस अधिकारी BNS की धारा 199(b) (सरकारी कर्मचारी द्वारा कानून के निर्देश का पालन न करना) के तहत अभियोजन और विभागीय कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे।
इस संबंध में पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक, साथ ही सभी जांच अधिकारियों, स्टेशन हाउस अधिकारियों और फॉरवर्डिंग अधिकारियों, यानी सर्किल अधिकारियों, अतिरिक्त SP, SP और लोक अभियोजकों को विशेष निर्देश जारी किए गए हैं।
मामला संक्षेप में
बेंच ने यह आदेश उम्मे फरवा द्वारा BNSS की धारा 528 के तहत दायर एक आवेदन पर दिया। उनका मामला था कि उनके पति/सूचना देने वाले (विपक्षी पार्टी नंबर 2) ने 2023 में एक FIR दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उनके तलाक के बाद, आवेदक और उसके साथी उन्हें फेसबुक पर धमकी दे रहे थे।
पुलिस ने पत्नी-आवेदक के खिलाफ IPC की धारा 504 और 507 के तहत मामला दर्ज किया।
हालांकि, जांच के बाद पुलिस ने आरोपों को निराधार पाया और 19 जून, 2024 को क्लोजर रिपोर्ट दायर की और पत्नी को बरी कर दिया। इसके बाद पति ने एक विरोध याचिका दायर की।
23 अक्टूबर, 2024 को अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने विरोध याचिका स्वीकार कर ली और क्लोजर रिपोर्ट खारिज की। न्यायिक अधिकारी ने CrPC की धारा 190(1)(b) के तहत अपराध का संज्ञान भी लिया और पत्नी-आवेदक को "राज्य मामले" में मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया। इसके बाद आवेदक-पत्नी ने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए यह याचिका दायर की, क्योंकि उनके वकील ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है और संबंधित न्यायिक अधिकारी जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने में विफल रहे।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता-पति (विपक्षी पार्टी नंबर 2) के वकीलों ने तर्क दिया कि संज्ञान-सह-समन आदेश में कोई अवैधता या कमी नहीं थी, क्योंकि आवेदक के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता था।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
शुरुआत में जस्टिस गिरि ने मजिस्ट्रेट द्वारा की गई एक मौलिक प्रक्रियात्मक गलती की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट ने CrPC के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए एक गैर-संज्ञेय अपराध के लिए IPC की धारा 506 और 507 के तहत गलती से संज्ञान-सह-समन आदेश पारित किया।
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट ने न तो 'गैर-संज्ञेय अपराध' का खुलासा करने वाली पुलिस रिपोर्ट को CrPC की धारा 2(d) के स्पष्टीकरण के प्रावधान के अनुसार 'शिकायत' में बदला, और न ही CrPC की धारा 190(1)(a) के तहत संज्ञान लिया ताकि शिकायत पर दायर 'समन-मामले की सुनवाई' के रूप में आगे बढ़ा जा सके।
बेंच ने कहा,
"इस मामले में अलीगढ़ के माननीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया और एक गैर-संज्ञेय अपराध को संज्ञेय अपराध माना।"
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के CrPC की धारा 190(1)(b) के तहत संज्ञान लेने और आवेदक-पत्नी को BNSS की धारा 223 के पहले परंतुक के तहत सुनवाई का अवसर दिए बिना समन जारी करने के कदम में भी खामियां पाईं और गलती से शिकायत के बजाय पुलिस रिपोर्ट पर दायर समन मामले की सुनवाई के रूप में आगे बढ़े।
दूसरी ओर, कोर्ट ने यह भी कहा कि SHO ने भी शुरुआत में कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया, मामले को CrPC की धारा 155 के तहत गैर-संज्ञेय रिपोर्ट के रूप में मानने के बजाय, इसे संज्ञेय अपराध मानकर FIR दर्ज की।
इस प्रकार, बेंच ने प्रथम दृष्टया राय दी कि इस मामले में अदालत की प्रक्रिया के साथ-साथ संहिता का भी दुरुपयोग हुआ, जिससे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ।
बेंच ने यह भी बताया कि IO ने पत्नी/आरोपी-आवेदक के संबंध में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते समय शिकायतकर्ता-पति के खिलाफ धारा 177 (जानबूझकर किसी सरकारी कर्मचारी को झूठी जानकारी देना) और IPC की 182 (झूठी जानकारी, जिसका मकसद सरकारी कर्मचारी को अपनी कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करके किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाना हो) के तहत किए गए अपराधों के लिए लिखित शिकायत दर्ज नहीं की।
कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि IPC की धारा 177 और 182 (BNS की धारा 212 और 217 के बराबर) को 'बेकार' नहीं बनाया जा सकता।
उसने टिप्पणी की:
“अगर पुलिस मशीनरी का गलत, तुच्छ या गुमराह करने वाली जानकारी देकर दुरुपयोग किया गया तो BNSS की धारा 215(1) के अनुसार एक लिखित शिकायत... दर्ज की जानी चाहिए... ऐसा न करने पर BNS की धारा 212 और धारा 217 BNS का मकसद बेकार हो जाएगा।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर फाइनल रिपोर्ट के साथ IPC की धारा 177 और 182 के तहत लिखित शिकायत नहीं है, तो ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट इसे स्वीकार नहीं करेंगे।
इस पृष्ठभूमि में बेंच ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
1. अगर कथित आरोपी के पक्ष में फाइनल रिपोर्ट यानी क्लोजर रिपोर्ट जमा की जाती है तो ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट/कोर्ट न केवल पूरे केस डायरी को दस्तावेजों और फाइनल रिपोर्ट यानी क्लोजर रिपोर्ट के साथ स्वीकार करेंगे, बल्कि IOs को शिकायतकर्ता के साथ-साथ FIR के गवाहों के खिलाफ झूठी जानकारी देने के लिए CrPC की धारा 195(1)(a) के तहत लिखित शिकायत दर्ज करने का निर्देश भी देंगे।
2. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट/कोर्ट, सबसे पहले पूरी केस डायरी और दस्तावेजों को देखने के बाद अपराधों का संज्ञान लेते समय अगर पहली नज़र में कुछ और लगता है तो शिकायतकर्ता से विरोध याचिका मंगवाएंगे और शिकायतकर्ता को सुनने के बाद अगर पाते हैं कि अपराध हुआ है तो CrPC की धारा 190(1)(a) या 190(1)(b) (BNSS की धारा 210(1)(a) या 210(1)(b)) के तहत संज्ञान लेंगे। अगर कोई अपराध नहीं बनता है तो लिखित शिकायत पर कार्रवाई की जाएगी, जो इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर द्वारा CrPC की धारा 195(1)(a) (BNSS की धारा 215(1)(a)) के तहत IPC की धारा 177 और 182 के अपराध के संबंध में FIR के कथित आरोपी के खिलाफ झूठी जानकारी देने के लिए पुलिस की कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करके कथित आरोपी व्यक्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए जमा की जाती है।
3. पुलिस महानिदेशक, राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश देंगे कि जांच पूरी करते समय, यदि आरोपी को बरी करने वाली क्लोजर रिपोर्ट अदालत में जमा की जाती है तो हर मामले में, जहां झूठी, तुच्छ या गुमराह करने वाली जानकारी देकर पुलिस मशीनरी का दुरुपयोग किया गया, BNSS की धारा 215(1) (CrPC की धारा 195(1)) के अनुसार लिखित शिकायत BNSS की धारा 212 और 217 के तहत उल्लिखित अपराध के सक्षम मजिस्ट्रेट/अदालत के समक्ष मामले के शिकायतकर्ता और गवाहों के खिलाफ दायर की जानी चाहिए।
4. BNSS की धारा 193 (CrPC की धारा 173) के तहत दायर क्लोजर रिपोर्ट के मामले में पुलिस संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट/अदालत को BNSS की धारा 215(1)(a) के अनुसार निर्धारित शिकायत के रूप में एक रिपोर्ट भी प्रस्तुत करेगी, ताकि शिकायतकर्ता और गवाह के खिलाफ BNS की धारा 212 और 217 के तहत प्रदान किए गए अपराधों का संज्ञान लिया जा सके, यदि क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली जाती है और विरोध याचिका खारिज कर दी जाती है।
5. यदि कोई IO जांच करता है और अंततः पाता है कि कोई अपराध नहीं बनता है तो वह BNSS की धारा 215(1)(a) के तहत प्रदान किए गए अनुसार संज्ञान लेने के लिए BNS की धारा 212 और 217 के तहत पुलिस को झूठी जानकारी देने के लिए एक लिखित शिकायत प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है।
6. अन्यथा, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर, स्टेशन हाउस ऑफिसर और फॉरवर्डिंग अथॉरिटी, यानी सर्किल ऑफिसर और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, सेक्शन 199(b) BNS (संबंधित सेक्शन 166A(b) IPC) के तहत उल्लिखित अपराध करने के लिए उत्तरदायी होंगे।
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर उसके दिए गए निर्देशों का अक्षरशः पालन नहीं किया जाता है तो यह कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी और पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों के ऐसे अवमाननापूर्ण आचरण के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए इस कोर्ट में आ सकता है।
बेंच ने आगे कहा कि कानून के अनुसार न्यायिक कार्यवाही को रेगुलेट करने के लिए पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों द्वारा यह सारी कार्रवाई इस आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर की जाएगी।
खास बात यह है कि हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के लिए झूठी सूचना देने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करते समय इस्तेमाल करने के लिए एक ड्राफ्ट टेम्प्लेट (हिंदी और अंग्रेजी दोनों में) स्पष्ट रूप से दिया।
इस फॉर्मेट में खास बयान शामिल हैं कि आरोप "झूठे, तुच्छ और दुर्भावनापूर्ण" पाए गए और इसमें जरूरी गवाहों की लिस्ट है, जिसमें स्वतंत्र गवाह भी शामिल हैं जिन्होंने घटना से इनकार किया।
मामले की खूबियों पर कोर्ट ने 23 अक्टूबर, 2024 का संज्ञान आदेश रद्द कर दिया और मामले को CJM, अलीगढ़ को तीन महीने के भीतर एक नया आदेश पारित करने के लिए वापस भेज दिया।
एडवोकेट मनोज कुमार पांडे की ओर से एडवोकेट सतीश कुमार दुबे आवेदक के लिए पेश हुए।
Case title - Umme Farva vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 25